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ओम शांति।
किसी एक राजा ने एक फकीर को खुश होकर स्वर्ण पात्र भेंट में दिया। उस स्वर्ण पात्र में एक अत्यंत सुंदर, रोचक , आकर्षक मछली भी थी—बहुमूल्य। वो फकीर उस पात्र को ले गया, और उसने सोचा, "मछली का सच्चा घर या तो समंदर है, या कोई नदी या तालाब।" ये स्वर्ण पात्र भले ही है, परंतु ये मछली फिर भी कैद में है, और मुझे इस मछली को कैद से मुक्त करना है। यह सोचकर वो उस पात्र को लेकर एक तालाब के पास गया, और उस मछली को तालाब में बहा दिया। और फिर उसने सोचा, "ये स्वर्ण पात्र लेकर मैं क्या करूँ? कहीं ये मेरा कारागार न बन जाए, कहीं ये स्वर्ण पात्र मेरे लिए कैद न बन जाए।" कुछ समय उसने सोचा, और उस स्वर्ण पात्र को भी उस जल में बहा दिया, और बहुत खुश होकर घर चला गया अपनी कुटिया में। दूसरे दिन उसने सोचा, "जाकर देखूँ तो वो मछली स्वतंत्रता में कैसी खुश है।" और वो वापस उसी तालाब में आता है, और आकर बड़ा आश्चर्य होता है उसे देखकर, एक दृश्य देखकर। वो देखता है, तालाब तो उथला है। उस तालाब के नीचे स्वर्ण पात्र है, और मछली वापस उसी स्वर्ण पात्र में तैर रही है। वो मछली वापस उसी पात्र में। कहानी पूरी हुई। बंधन एक आदत है, एक व्यसन है। जो लंबे समय से बंधन में रहा है, उसे बंधन ही प्रिय है। जो लंबे समय कैद में रहा है, उसे कैद ही प्रिय है। और ऐसा ही कुछ तब भी हुआ था, जब 1799 में फ्रांस में क्रांति हुई थी। फ्रांस का सबसे बड़ा प्रिजन, बेस्टल, वहाँ पर कैदी थे, गुलाम थे। कोई 10 साल से, कोई 20 साल, कोई 50 साल, कोई 60 साल। उनके हाथों में हथकड़ियाँ थीं, पैरों में हथकड़ियाँ थीं। अंधेरा। फ्रांस में क्रांति हुई। क्रांतिकारियों ने सत्ता को हिला दिया। विपलव हुआ, विद्रोह हुआ चारों तरफ। और आखिरकार सत्ता पलट हुई। क्रांतिकारी जीत गए। और सबसे पहला कार्य क्रांतिकारियों ने यह किया कि जाकर जो-जो कैद में है, कोई जवानी में कैद में चला गया था, अब बूढ़ा हो गया, अभी तक कैद में ही था, उस बेस्टल प्रिजन को तोड़ दिया। सभी कैदियों से कहा, "तुम सब मुक्त हो। जीत हमारी हुई।" उनकी बेड़ियाँ, हाथों की और पैरों की बेड़ियाँ तोड़ दी, और वो सारे कैदी बाहर निकल गए। कितने हजारों कैदी उसमें कैद थे। देश गुलाम था। स्वतंत्रता संग्राम हुआ। परंतु एक आश्चर्यचकित घटना हो गई। शाम होते-होते सभी कैदी वापस अपनी कैद में चले गए। कुछ-कुछ कैदी बेचैन हो गए, रोने लगे कि हमें वापस उस कैद में जाना है। ये हाथ खुले हैं हमारे, हमें नहीं चाहिए हाथ खुले। हमें तो उन बेड़ियों की आदत पड़ गई है। हमें वही बेड़ियाँ चाहिए। और अब हम करें क्या? हमारा परिवार नहीं रहा, कुछ नहीं रहा। कहाँ जाएँ हम? कौन नौकरी देगा? जब कैद में थे तो सुरक्षा तो थी। जब कैद में थे तो भोजन तो मिलता था, चाहे कैसा भी मिलता हो। हमें वापस कैद चाहिए। और शाम होते-होते सभी कैदी वापस अपने-अपने सेल में चले गए। यह कैसी विडंबना है, जहाँ चेतना तो चाहती है मुक्त होने के लिए। उसकी सबसे बड़ी कामना है मुक्ति, स्वतंत्रता। पर भीतर ही भीतर, कहीं न कहीं, अपने ही कैद से और अपने ही कारागार से और अपने ही सलाखों से और बेड़ियों से ऐसा प्यार हो गया है कि उस प्रेम से वो छूट ही नहीं सकती, चाहे वो मछली हो या मनुष्य। और यही एक भ्रम निरंतर रहता है। हर एक जो कैद में है, यही सोचता है, "मैं मुक्त हूँ।" हर एक जो कैद में है, यही सोचता है कि मुझे मुक्त होना है। पर जब होने का अवसर आता है, उसे वही गुलामी फिर से आकर्षित करती है। हर एक कहता है कि मुझे सुख चाहिए, परंतु दुखों के प्रति प्रेम है। दुख से ही प्रेम है। यदि 100 लोग आकर स्तुति करें, वो याद नहीं रहता है। परंतु कोई एक निंदा करे, तो उसके वो शब्द व्यक्ति पकड़ता है और दिन-रात उस पर चिंतन करता है और और दुखी होता है। मनुष्य जीवन एक विचित्र पहेली है, एक पजल, एनिग्मा, अकन ड्रम, जिसे वह खुद समझ नहीं पाता और बंधन में रहता है। चाहे उसे बाहर का सारा ज्ञान ही क्यों न मिल जाए, फिर भी वह सूचनाएं उसे भरती नहीं। और हर एक के अंदर इसलिए एक अतृप्ति, एक खालीपन, एक रिक्त, एक वॉइड, एक वैक्यूम रहता है। कैसे भरे उस खालीपन को और किससे भरे उस खालीपन को? तो आप सबको यह सुंदर अवसर मिला है स्वयं को देखने का, स्वयं की पड़ताल करने का, पीछे मुड़कर देखने का, रुकने का, स्वयं से बातें करने का, इस जीवन के विषय सोचने का। और शायद जैसे संसार के लोग भाग रहे हैं, हम भी भाग रहे हैं। और ऊपर से हमने बहुत सारे लेबल्स चिपकाए हैं: सेवा, ड्रामा, हिसाब-किताब, श्रीमत, योग। पर भीतर ही भीतर एक रिक्त, एक खालीपन। तो सभी एक मिनट के लिए आंखें बंद करेंगे और देखेंगे अंतकरण में कि मेरे भीतर कौन सा खालीपन है। केवल देखना है, अपने ही भीतर क्या दिखाई दे रहा है: उजाला या अंधकार, भय या प्रेम, बेचैनी या शांति। ओम शांति। तीन दिन की साधना है, और साधना अत्यंत मौन में और अत्यंत एकांत में की जाती है। इसलिए जितना हो सके, अगले तीन दिनों के लिए बातचीत को एकदम कम कर देना है। अगर बोलना ही पड़े, तो पुरुषार्थ संबंधित , ज्ञान संबंधित, अन्यथा कुछ भी बोलने की आवश्यकता नहीं है। कुछ पूछने की भी आवश्यकता नहीं है। यहां बैठे-बैठे या सुबह योग करते-करते या दिन भर यहीं इर्दगिर्द घूमते हुए, हो सकता है किसी मौन क्षण में हमें अपने ही किसी लंबे समय के प्रश्न का उत्तर मिल जाए। उत्तर वही है, बस दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि आंखों के सामने धुंध सी है, फागी है। तो पहला नियम: मौन, चुप। कोई दूसरा बात करता है, तो करने दे, हम न करें। अगर यहां से कुछ लेकर जाना है, तो कुछ तो त्याग करना पड़ेगा। हमारा एक मित्र था, उसकी माता जी जब भी तीर्थ यात्रा पर जाती थी, तो एक उसकी जो फेवरेट डिश है, वह छोड़कर आती थी हमेशा के लिए। और हर साल एक जगह तीर्थ यात्रा पर जाती थी, जो उसको सबसे अच्छा लगता है। हरिद्वार जाएगी, गुलाब जामुन छोड़ दिया। अगले साल कन्याकुमारी जाएगी, वहां और कुछ छोड़ दिया। ऐसे तो यहां आए हैं, तो बातों को छोड़ देना है तीन दिन के लिए। तो झोली में कुछ गिरेगा। दूसरा, सबके बीच में अनुभव करना है एकांत का। बड़े भीड़ में बैठे हैं, पर योग कभी भी सामूहिक होता ही नहीं। योग हमेशा व्यक्तिगत ही होता है। हां, संगठन की शक्ति कार्य करती है, और संगठन की शक्ति में एकाग्रता बढ़ती है। और एक कलेक्टिव कॉन्शसनेस में भटकता मन स्थिर होता है। फिर भी ऐसा अनुभव करना है अगले तीन दिन कि मैं अकेला ही हूं और अकेली हूं। और अपने जीवन के लंबे सफर के बाद, जैसे किसी चट्टान पर खड़ा हूं, खड़ी हूं, और वहां से पूरी यात्रा को देख रही हूं। कौन-कौन से पड़ाव आए, किन-किन स्थानों पर हम घूमे, कौन-कौन से लोग मिले, कैसी-कैसी परीक्षाएं आई, इस जीवन ने क्या-क्या सिखाया। सब कुछ मधुबन वो मौन केंद्र है, मधुबन वो मौन बिंदु है, मधुबन वो सर्वोत्तम शिखर है। और आप भाग्यशाली हैं जो यहां आए, और अवसर मिला। यह न भूलना, यह साधारण स्थान नहीं, एक ऐसा स्थान जहां भगवान ने अपने कदम रखे थे। एक ऐसा स्थान जहां पर परमात्मा वाणी आज भी गूंज रही है। एक ऐसा स्थान जहां कीटों में, जहां के कंकड़ पत्थरों में, जहां के पेड़ों में प्रभु प्रेम के प्रकंपन हैं। सुबह-सुबह उठकर उस वाइब्रेशंस को, उन सभी वाइब्रेशंस को कैच करना है। यहां आए हैं, तो तीन दिन केवल यही एक ही कार्य करना है। भट्टी शब्द भी हटा दो, उसमें भी एक तनाव अनुभव होता। भट्टी अर्थात बैठकर क्लास सुननी पड़ेगी। एक घंटा बैठकर योग करना पड़ेगा। लंबा-लंबा पैर में दर्द, पीठ में दर्द, कमर में दर्द। कुछ लिखना पड़ेगा। रिलैक्स सोचो, एक सरोवर है। इस सरोवर में हम डुबकी लगाने आए हैं, इसलिए स्वयं को डुबो देना है और लवा लप भर देना है। और कुछ त्याग करना पड़ेगा, और कुछ मेहनत करनी पड़ेगी। कुछ संकल्प करने पड़ेंगे , क्योंकि ऐसा स्थान, ऐसा अवसर फिर शायद कभी न मिले जीवन में। क्योंकि इस जीवन का भी तो भरोसा नहीं। यह जीवन भी तो कितना अनित्य है। आज है, कल नहीं। इसलिए सुबह-सुबह, डेढ़ पौने दो बजे उठ जाओ, बैठो शक शांति स्तंभ पर, हिस्ट्री हॉल में, कुटिया में, उस सन्नाटे में, उस एकांत में। और उन प्रकंपन को कैच करो। यह सारी क्लासेस, यह सब मिल जाएगा, पर अनुभव इतना सस्ता नहीं है कि जो मीडिया पर मिले। ज्ञान तो मिलेगा, सब मिल जाएगा। टू मच है ज्ञान, तो बाढ़ आई है। एक बाढ़ चारों तरफ मीडिया में, पर सब होते हुए भी अनुभव का अकाल है। इसलिए सुबह-सुबह उठो, जल्दी सो जाओ। तीसरा नियम, हो सके तो मोबाइल को बंद कर दो। स्विच्ड ऑफ, साइलेंट नहीं। स्विच्ड ऑफ, टच ही न हो तो बहुत अच्छा। स्पर्श न हो तो बहुत अच्छा। रख दो उसको। और मन को आदेश दो, संकल्प दो कि इन तीन दिनों में मुझे उस मौन का अनुभव करना है, उस एकांत का अनुभव करना है, उस प्रभु प्रेम का अनुभव करना है, उस प्रभु प्रेम के झरने में नहाना है। और रुककर अपने जीवन को भी देखना है, मैं कहां भाग रहा हूं। और रुककर यहां से जाने से पहले आगे क्या करना है, इसका एक सूक्ष्म प्लान भी बनाकर जाना है। तो यहां के तीन दिनों का एक-एक पल अत्यंत बहुमूल्य है। उसका हम क्या करते हैं, हमारे पर है। आराम से सब कुछ चल रहा है। सुबह बैठे, थोड़ी देर, आधा घंटा उठे, मुरली गए, थोड़ा सा सुना, फिर भोजन, फिर बातें, फिर क्लासेस, फिर बातें, फिर क्लास, फिर बातें। और यह सब में तीन दिन चले जाएंगे। और फिर हम जाकर सुनाएंगे, बहुत अच्छी भट्टी थी, बहुत अच्छी क्लासेस थी, पर यहां का प्रभाव कुछ ही दिन चलेगा। 10-12 दिन बस। जो संस्कार है, जो गहरा संस्कार है, एडिक्ट है, एडिक्शन है, कमजोरी है, विकार है, कोई लूप होल, कोई फ्लॉ, कोई डिफेक्ट, कोई उलझन, कोई चिंता, कोई भय, वह जो क्या त्यो, हमें अपने ही अचेतन में पहुंचना है। यहां बहुत गहराई में तो बाहर की सारी आवाजें, बाहर के सारे लोग, सबको हटाना होगा। और रुककर सोचना होगा, मैं कहां खड़ा हूं, कहां भाग रहा हूं। शायद जहां भाग रहा हूं, वह एक भ्रम जाल है, एक मृग तृष्णा, एक मृग मरीचिका अमिराज। रेत में धूप पड़ती है और रेत चमकती है, पानी सी दिखती है। प्यासा राही भटक रहा है, उसको लगता है पानी भागता है, और देखता है पानी है ही नहीं। वहां क्या है? वहां तो चमकती हुई रेत है। इसको ही मुरलियों में रुण का पानी कहा है। और कई बार यह शब्द मुरलियों में आया है, मृग तृष्णा। और मनुष्य इसलिए अपने आप को, मेरे जीवन में क्या हो रहा है, यह शब्द भी हटा देना है। एक साक्षी भाव उत्पन्न करना है, मनुष्य के जीवन में क्या हो रहा है। जब इस तरह से चिंतन होता है, तो वह मेरे और मैं से उठकर हम अपने ही जीवन के प्रति एक साक्षी दृष्टि अपनाते हैं। और जो साक्षी होता है, उसे वह दिखाई देता है जो उस अभिनेता को नहीं दिखाई देता। दर्शक वह देख सकते हैं। तो यह तीन दिन की भट्टी, दर्शक होने की भट्टी है, मौन की भट्टी है, अंतर्मुखी भट्टी है, स्वचिंतन की भट्टी है, ज्ञान की भट्टी है, योग की भट्टी है, धारणा की भट्टी है। तो अपने ही मन से बातें करनी है कि मुझे यहां से क्या ले जाना है। कुछ ऐसा ले जाओ जो जीवन ही बदल दे। हम भटकते रहते हैं, भीतर ही भीतर। संसार में वह लोग हैं जो ज्ञान आत्मा परमात्मा को नहीं जानते, और दूसरे वह लोग हैं जो आत्मा परमात्मा को जानते हैं। पर दुखी यह भी है, और वह भी है। उनके दुख दूसरे हैं, तो इनके दुख दूसरे हैं। यहां बड़े-बड़े दुख हैं, वहां छोटे-छोटे दुख हैं। यहां दुख है कि पुरुषार्थ नहीं हो रहा है। यहां दुख है कि आज अमृत वेला मिस कर दिया, तो इसका गिल्ट 24-23 घंटे चल रहा है। वह मिस करने से भी बड़ा पाप है यह कि यह भावना कि मेरा मिस हो गया, मेरा मिस हो गया, मेरा मिस हो गया, और उसी में दुख में बीत रहा है पूरा। अपने आप को संभालना भी है। ठीक है, मिस हुआ, अब बैठो दो घंटा। व तनाव यदि उत्पन्न किया, तो पुरुषार्थ नहीं होता है। पुरुषार्थ का भी टेंशन होता है। इसलिए यह सब सोचने के लिए क्या चाहिए? एकांत। एकांत में बैठो। यहां क्लास में बैठे-बैठे भी, सुनते-सुनते भी, अपने जीवन में डुबकी लगाते रहना है। कंपेयर, कंट्रास्ट, चेक। सी, सबसे पहली महत्त्वपूर्ण बात है डायग्नोसिस। उसका इलाज बाद में करेंगे, वह छोड़ दो। पहला क्या चाहिए? परफेक्ट डायग्नोसिस। वह हो गया, तो इलाज अपने आप हो जाएगा। अभी डायग्नोसिस ही गलत है। मोह है, हमने चिपका के रखा है डायग्नोसिस। प्रेम हमारा निदान है, प्रेम है। यह तो, अरे, प्रेम कभी था ही नहीं। वह तो मोह था, वह तो वासना थी, वह तो अकेलेपन का भय था, वह तो मालकियत थी, वह असुरक्षा थी, इनसिक्योरिटी थी जो हमने थोप के रखा कि यह प्रेम है। प्रेम वह कभी था ही नहीं। तो इन सब चीजों के लिए क्या चाहिए? अच्छा मौन। आज सुबह की साकार मुरली, यह बड़ी गंभीर बातें हैं। कैसी बातें हैं? सूक्ष्म और गंभीर बातें। यदि गंभीर बातों को समझना है, तो बुद्धि भी इतनी सूक्ष्म और इतनी गंभीरता चाहिए। तो आज के इस सत्र में ब्राह्मण जीवन की हम ऐसी 10 बातें देखेंगे जो मृग तृष्णा जैसी है। और जब भी आप किसी भी क्लास में बैठो, चाहे क्लास में या मुरली में, तीन बातें कंपलसरी होनी चाहिए। पहला, सुनना। सुनना कैसे है? संपूर्ण होश में और सजगता से। सुन रहे हैं, तो केवल सुन रहे हैं। बाकी सब बातों को हटा दो। बुद्धि से आदेश दो उसको, मुझे सुनना है। और सुनना इसलिए नहीं कि सुनाने वाला अत्यंत बुद्धिमान है या मुझसे बड़ा है। इसलिए नहीं, क्योंकि उस सुनते-सुनते हो सकता है हमारे ही मन में, हमारे ही किसी अपनी उलझन का एक उत्तर आ जाए जो कि वक्ता ने सुनाया ही नहीं। उसने तो बोला ही नहीं उस विषय में। और दूसरा, सुनते-सुनते कंपलसरी लिखना है। नोट्स। खाली बैठना नहीं है। खाली बैठना अर्थात भक्ति मार्ग। बहुत अच्छा, बहुत अच्छा। कनरस। आहा! तो डायरी तो दिखाई नहीं दे रही है। अभी-अभी खोलो। कंपलसरी नोट्स बनाने की आदत डालनी है। बाजू से पेन लो और पेज लो। उसके सिवा क्लास आगे नहीं बढ़ेगी। हम गॉडली स्टूडेंट हैं। स्टूडेंट लाइफ अर्थात स्टूडेंट लाइक एटीट्यूड। हो सकता है लिखते-लिखते कुछ ऐसा पॉइंट टच कर जाए, कोई ऐसी बात आ जाए और हम लिख दें। यहां से चले जाएंगे। आप एक साल बीत जाएगा और फिर अचानक एक दिन यह डायरी खोलोगे, तो याद आएगा यह कब लिखा था, किस समय लिखा था। उन शब्दों में मधुबन की खुशबू होगी। कहां लिखा जा रहा है, वह भी तो महत्त्वपूर्ण है। और हो सकता है लिखते-लिखते जरूरी नहीं है जो सुनाया जा रहा है, वह आप लिखेंगे। हो सकता है कोई नया टचिंग हो जाए, कोई नई टचिंग। अचानक विचार आ जाए, उसको हमने लिख दिया। और लिखते समय भी शायद हो सकता है बेहोशी में लिख दिया और उसका अर्थ बाद में पता चले कि ऐसा हमने लिख दिया। इसमें तो जीवन का जो उलझन है, 10 साल से चल रही है, यह उत्तर है उसका। इसलिए मधुबन में किया हुआ हर कर्म श्रेष्ठ है और लिखना सर्वश्रेष्ठ कर्म है। इन हाथों ने बड़े पाप किए हैं। बहुत पापी हाथ हैं। यह हाथों के पाप कैसे धुले गे? लिखने से, राइटिंग से। और लिखना भी कैसे है? एक भाई ने अपनी डायरी दिखाई थी मुरली क्लास की। उसने कहा, इतनी नींद आ रही थी, पूरा गोल-गोल, गोल-गोल, गोल-गोल, गोल-गोल। क्या लिखा, उसे ही नहीं पता। सजगता से लिखना है, होश में लिखना है और सुलेख लिखना है। बहुत सुंदर हस्ताक्षरों में ऐसे लिखो कि कोई जल्दी में भी पढ़े, तो पढ़ सके। प्रिंट हैंडराइटिंग। धीरे-धीरे। जल्दी किसने बोला है? स्लोली, स्लोली, स्लोली। एक-एक अक्षर, एक-एक स्ट्रोक, शिरोरेषा, मात्रा, सब कुछ। तो यह तीसरा कार्य योग। सुनते-सुनते लिखना है और लिखते-लिखते योग करना है। तो यह तीन कार्य एक साथ होते रहे। चाहे मुरली सुन रहे हो, चाहे क्लास सुन रहे हो, या यहां से जाने के बाद कभी भी, उसके लिए एक अच्छी डायरी चाहिए, एक अच्छा पेन, पेंसिल, स्केच पेन, कलर पेन, सब रखना है। कहीं डायग्राम, सब कुछ। एक विद्यार्थी। विद्यार्थी जीवन कैसा होता है? सब होता है। सारी अव्यक्त मुरलियों की किताबें हमारे टेबल पर हो, ज्ञान की अच्छी-अच्छी किताबें हो, सारी लिखने की सामग्री हो और एक फिक्स जगह हो, तो बहुत अच्छा। अगर नहीं है, घर छोटा है, वह अलग बात। नीचे बैठ के कर सकते हैं। पर एक स्टूडेंट लाइक एटीट्यूड को अपनाना है।
10 Points of मृग तृष्णा
1. संबंध : - तो सबसे पहला है, इस जीवन की सबसे बड़ी मृग तृष्णा है संबंध। इस व्यक्ति से जो संबंध है, इस व्यक्ति से मुझे सुख मिलेगा। आत्मा से मुझे सुरक्षा मिलेगी, आत्मा से मुझे प्रेम मिलेगा, आत्मा से मुझे केयर, अटेंशन, लव। यह सबसे बड़ी मृग तृष्णा है, यह सबसे बड़ी मृग मरीचिका है। जो हमको दिखाई देता है कि इस दोस्ती में बहुत प्यार है, पर यह एक भ्रम है, खालीपन है। दो व्यक्ति खाली हैं, वह एक दूसरे को कैसे भर सकेंगे? भरने वाला एक परम ही है। इसलिए जितने हमने विस्तार कर रखे हैं, इससे दोस्ती, उससे दोस्ती, इससे। और टाइम कितना जा रहा है और एनर्जी कितनी जा रही है? कॉल, चैट, लंबी-लंबी बातें फोन पर। और परेशानी होती है, तो उस व्यक्ति की याद आती है कि वह मेरे लिए कुछ करेगा। और जब नहीं करता है, तो अपेक्षा भंग होती है। उसका दूसरा दुख। और उसमें जो दिखावे करने पड़ते हैं, गिफ्ट-विफ्ट देने पड़ते हैं, स्वयं को सजाना पड़ता है। मेकअप हटा और ब्रेकअप। यह एक भ्रम है कि हमें लगता है इस व्यक्ति से सुख मिलेगा, स्त्री से, इस पुरुष से सुख मिलेगा। ना किसी स्त्री से, ना किसी पुरुष से। हमें सुख किसी से नहीं मिल सकता। ना सीनियर से, ना साथी से, ना जूनियर से, ना स्टूडेंट से, ना बाहर वालों से। क्योंकि सुख उनके पास है ही नहीं। एक शिकारी भटक गया। तीन दिन तक भटकता रहा जंगल में। कोई नहीं, कोई मनुष्य नहीं, कोई पंछी, परिंदा, कुछ नहीं। अकेला जंगल में भटक रहा है। कुछ तो मिल जाए, कोई तो मिल जाए। और एक दिन, तीन दिन के बाद देखता है, झाड़ के नीचे कोई व्यक्ति बैठा है। भाग कर जाता है उससे मिलते और पता चलता है, वह भी एक शिकारी है और वह भी कई दिनों से भटक रहा है। बहुत खुशी होती है दोनों को। अब दोनों साथ-साथ भटक रहे हैं। इसी को दोस्ती, मैत्री, विवाह, जो भी नाम दो। पहले अकेले भीख मांग रहे थे, अब दूसरा भिकारी मिला। अब साथ-साथ भीख मांगते हैं, कटोरा लेकर। फिर भी मोह नहीं छूटता। हमारे विमान की रस्सी यदि कोई पकड़ के है, तो हम कैसे उड़ेंगे? हमारी छाती पर किसी की याद बैठी है, तो हम वापस कैसे जाएंगे? यह मार्ग अकेले का मार्ग है। यहां देह धारियों को साथी बनाना, अर्थात कैद। सोचना कि मैं इसको अपने दिल की सारी बातें बताता हूं और बताइए, अपने आप भगवान से शेयरिंग कम हो जाएगी। पहली बात। और उसको कितना भी बताए और उसने कितना भी समझ भी लिया, करेगा क्या? हर व्यक्ति के अपने बंधन हैं, अपने हिसाब हैं और वह उसे ही चुप तो करने हैं। भगवान भी आ जाए सामने, सब कुछ बता दिया, टोली दे दी, यह दे दी। पर जो बंधन है, वह तुम्हें खुद ही उससे मुक्त होना होगा। इसलिए यह समझना कि व्यक्तियों से सुख मिलेगा, व्यक्तियों से शांति मिलेगी, प्रेम मिलेगा, सपोर्ट मिलेगा, सहारा मिलेगा, आधार मिलेगा, सांत्वना मिलेगी। कोई कंधा चाहिए, जिस पर मैं अपना सिर रखूं और रोऊं। कोई आए, मैं बीमार हूं हॉस्पिटल में, कोई मुझे देखे, यहां हाथ रखे, पूछे, अब कैसे हैं? और फिर मैं कहूं, कल से थोड़ा ठीक है। कोई गिफ्ट लाए, कोई याद रखे, हमारा भी जन्मदिन है। हमने तुम्हारा जन्मदिन याद रखा था, तुमने हमारा नहीं रखा। हमको भी पूछे, हमको भी बिठाए। स्टेज का मोह, माइक का मोह, यह सब क्या है? ब्रह्म जाल। यह सबसे पहला संबंध। एक वरदान था, जिसमें बाबा ने कहा था, बंधन का कारण है संबंध, बंधन का बीज है संबंध। जब तक इसको नहीं चेंज करते, किसी को हमने कुछ मान लिया है, यह मेरा वह है, तो अपने आप फीलिंग और इमोशंस वैसे ही रहेंगे उस व्यक्ति के प्रति। इसलिए अपने सारे बंधनों को चेक करना है। व्यक्तियों से जो संबंध है, उनको। और कल अमृत वेला, उस संबंध को ऐसे हाथ में रखना है, बाबा के सामने और बाबा से पूछना है, क्या यह संबंध तुमको स्वीकार है? भाई का बहन के साथ, मेरा यह जो संबंध है, तुमको स्वीकार है? बहन का बहन के साथ, क्या यह संबंध तुमको स्वीकार है? मनुष्य का प्राणियों के साथ। प्राणियों में भी बहोत मोह होता है। अभी-अभी एक पेशेंट एडमिट थे हमारे आईसीयू में, बहुत ज्यादा बीपी बढ़ गया था, 250। तो बोले, मुझे छुट्टी चाहिए, नहीं तो मेरे साथ कुत्ते हैं, वह मेरे बगैर सो नहीं सकते हैं। सेवन डॉग्स, उसमें बुद्धि है, वह भी एक मोह ही है। पेट स्थान तो सबसे पहला ब्रह्म जाल है। संबंध
2. दूसरा शरीर। यह शरीर किसी और के शरीर में सुख प्राप्त करना, किसी शरीर को देखना, आसक्त होना, किसी और के शरीर के स्पर्श में बंध जाना, यह सबसे बड़ा माया जाल है। हमको लगता है, उसमें सुख है। गीता में लिखा है, ऑल द टच बोर्न हैप्पीनेस इज कंडीशंड टू पेन। वह सारे सुख जो स्पर्श से उत्पन्न होते हैं, अंततोगत्वा दुख की ओर ले जाते हैं। जो सुख स्पर्श से उत्पन्न होते हैं, यह शरीर उपयोग के लिए है, हमारी पहचान नहीं है। यह शरीर साधना के लिए है, तपश्चर्या के लिए और सेवा के लिए, भोग में डुबोने के लिए नहीं है। जितना शरीर को भोग में डुबो ग, डुबो ग, उतना वह रोगी बनेगा, कमजोर बनेगा, बीमार हो जाएगा, रोग ग्रस्त हो जाएगा। इसलिए जबरदस्ती नहीं देखना, क्या मिला? यह शरीर की वासना है, तो मिटती ही नहीं है। जीवन भर भोग विलास, उसके बाद में भी समाप्ति का तो कोई सवाल ही नहीं है। इच्छा है शरीर की, तो सागर की लहरों जैसी आती ही रहती है। हां, एक के बाद एक, एक के बाद एक, एक के बाद एक। मेंटल इमेजिनेशन, कल्पनाएं। व वास्तव में हम किसी व्यक्ति के शरीर को मिस नहीं करते हैं। उस शरीर से प्राप्त जो अनुभव है, उस अनुभव को मिस करते हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई कुत्ता है और उसको एक सूखी हड्डी मिल जाए, और वह हड्डी को चबाता है, और उसको लगता है वह सुख हड्डी से आ रहा है। पर वह हड्डी से नहीं आ रहा है, उसके ही मुंह से खून बहता है। वह खून ही खुद पीता है। पुरुष को लगता है यह सुख स्त्री से आ रहा है, और स्त्री को लगता है यह सुख पुरुष की देह से आ रहा है। वह वहां से आ ही नहीं रहा। वह स्वयं के ही शरीर में हार्मोनल सेक्रेशन हो रहे हैं। डोपामिन, सेरोटोनिन, ऑक्सीटोसिन, एड्रीनलीन, सारे हार्मोन रिलीज हो रहे हैं, और वह उसे सुख की अनुभूति कराते हैं। पर यह सारे हार्मोन, इनको धोखे वाले हार्मोन कहते हैं। यह वादे बड़े-बड़े करते हैं, पर धोखा देते हैं। और तुरंत स्पाइक होता है, डोपामिन डंपिंग। फिर वापस वह हार्मोंस कम हो जाते हैं। इसलिए हर भोग के बाद व्यक्ति अपने आप को खाली, अकेला, कमजोर, गिल्ट कॉन्शियस से भरा हुआ महसूस करता है। और इसलिए इस देश के लोगों ने ब्रह्मचर्य की इतनी महिमा गाई है। देखा है कि यह तो ऊर्जा है। एक इस ऊर्जा को दबाया नहीं जा सकता। अगर इसको दबाया, वह निकलती है बाहर। 10 साल, 20 साल के बाद भी कितने सारे हैं जिन्होंने जाकर शादियां कीं। इससे अगर भागे, तो किधर भी भागो, यह पीछा नहीं छोड़ेगी। अगर इसको परास्त किया, वह परास्त होती नहीं है, क्योंकि वह शक्ति है। ना उसको दबाया जा सकता, ना उसे हराया जा सकता, और ना ही उससे भागा जा सकता है। केवल एक ही चीज की जा सकती है, उसका रूपांतरण। लोगों ने इसका रूपांतरण कला में कर दिया, कला क्षेत्र में आगे चले गए, स्पोर्ट्स में कर दिया, स्पोर्ट्स में आगे निकल गए, महान लेखक बन गए। और जो अध्यात्म की तरफ बढ़े, वही ऊर्जा जो नीचे बह रही थी और शरीरों को जन्म दे रही थी, वही ऊर्जा हृदय में गई और करुणा बनी। और संसार का उद्धार किया, वही ऊर्जा गले में गई और व्यक्ति की वाणी में और आवाज में ऐसा तेज, ऐसा प्रभाव, वही ऊर्जा मस्तिष्क में जाकर ओछ में कन्वर्ट हो जाती है। ब्रह्मचर्य साधना नहीं, परिणाम है जीवन के महान लक्ष्य का। जिसने देख लिया है, यह ऊर्जा नष्ट हो रही है। और ऊर्जा जब नष्ट होती है, तो कमजोरी आती है। इसलिए दूसरा मोह जाल, दूसरी मृग मरीचिका, दूसरी मृग तृष्णा है इस शरीर की। इस शरीर की सच्चाई को समझना है। देखो, इस शरीर को क्या है। इसमें भागना नहीं है। इससे हॉस्पिटल में जाकर चक्कर लगाओ। देखो, टीबी के मरीजों को कहां है सौंदर्य। देखो, इन कैंसर के पेशेंट को, उन डायलिसिस के पेशेंट को, उन बर्न वार्ड में जाकर देखो। सरकारी अस्पताल में बर्न के पेशेंट होते हैं, ना? अलग वार्ड होता है उनका, जले हुए होते हैं। कोई देखने नहीं आता है। हमारे हॉस्पिटल में एक पेशेंट थी, आठ मास थी। उसके रिश्तेदार आए, उसको एडमिट किया और चले गए। सब झूठे नंबर दे दिए। जो कभी कांटेक्ट नहीं हो पाया, उसको देखने, उसके बाद कभी कोई नहीं आया। अत्यंत पीड़ा। इस देह की सच्चाई क्या है? उसको देखो। शमशान में जाओ, बैठो और जलती हुई चिताओं को देखो। कहां है सौंदर्य, जिसके पीछे इतना आकर्षण, जिसके पीछे इतना पागलपन? सारा मीडिया, सारी मूवीज, सारी वेब सीरीज, सारा सोशल मीडिया, किताबें इस देह के इर्दगिर्द हैं। इस शरीर में ऐसा है क्या? आंखें खोलकर सच्चाई को देखेंगे, तो यह शरीर ना आकर्षित करेगा, ना इससे भयभीत होंगे। और पता चलेगा, इसी शरीर में श्रेष्ठ साधना की जा सकती है, तपस्या की जा सकती है और अतिंद्रिय सुख का अनुभव किया जा सकता है। शरीर से ऊपर एक सुख है, नहीं तो मनुष्य जीवन सारा शरीर की इच्छा, शरीर की तृष्णा, शरीर की वासना, शरीर के धर्म, शरीर का सौंदर्य, शरीर का स्पर्श, शरीर का आलिंगन, शरीर का मिलन, शरीरों का मिलन, इसमें जीवन बीत जाता है। और ऊपर से सब कर रहे हैं, अमृत वेला, मुरली, ज्ञान, योग। पर अंडरग्राउंड शरीर देखो, सोचो। विवेक, विचार। अगले तीन दिनों में विचार करना है। यह विचार की साधना है, विवेक की साधना है। देखो, यह है सच्चाई। हम किस भ्रम में जी रहे हैं? आज की साकार मुरली दो बार आया है, अशरीरी भव। सुबह की साकार मुरली। क्यों भगवान बार-बार कह रहा है? वह तो दिखता ही नहीं। अशरीरी आत्मा दिखता है, शरीर। और सारी साधनाएं अदृश्य की साधनाएं। इसलिए सोचना है, जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, दुख, दोषा, अनुदर्शन। हे अर्जुन, सुन। जन्म में दुख है, मृत्यु में दुख है, जरा में दुख है, व्याधि में दुख है। बीमार होते हैं, तो कितना पीड़ा होती है। बुढ़ापा अपने आप में एक बीमारी है। ध्यान नहीं देते लोग। जिस शहर में बेटा रहता है, उसी शहर में वृद्धाश्रम में मां-बाप रहते हैं। सुनाई नहीं देता, दांत गिर जाते, देख नहीं सकते, खा नहीं सकते। हम देखते हैं, हॉस्पिटल में बूढ़े लोग आते हैं कि बेटे एडमिट करके चले जाते और अपना एक स्टाफ रख जाते हैं। वह खुद नहीं आते कभी देखने। फिर कोई एक सर्वेंट रह जाता है। वह लास्ट दिन आते हैं, डिस्चार्ज जब होता है, तब तक नहीं आते। अधिकतर एनालिटिक स्टडी करनी है कि कहां है यह, जिसे हम समझ रहे हैं। बहुत सुंदर, बहुत सुंदर, बहुत सुंदर। यह सौंदर्य भी एक भ्रम है, एक मानसिक भ्रम। वास्तविक सौंदर्य चेतना में, पवित्रता में। अगर सुंदर दिखना है, तो अशरीरी हो जाओ। कितनी अच्छी विधि है, शरीर से गायब।
३. तीसरा है सुविधाएं। यह मार्ग कठिन मार्ग है। जो सुविधाओं में घिरा रहता है, वह कभी कुछ नहीं पा पाते। अगर आप किसी भी क्षेत्र में जाओ, खबीब नाम का एक बॉडीबिल्डर हुआ है, अभी भी है। 27, 29 मैचेस उसने खेले। 29 के 21, 29 ही वाज विनर। उसके पिताजी ने उसको बचपन से ही ऐसी ट्रेनिंग दी। सुबह, शाम, दोपहर, बस प्रैक्टिस, प्रैक्टिस, प्रैक्टिस। एक मिनट भी आलस नहीं। तुम्हारे लिए कंफर्ट है ही नहीं। सुख सुविधाओं के लिए तुम तुम्हारा जन्म हुआ ही नहीं है। खबीब की जीवन कहानी सुनो। बचपन में 9 साल का खबीब था। एक जंगली भालू के पास उसको छोड़ दिया लड़ाई करने के लिए। पीक नाम की एक किताब है, जिसमें लिखा है। और खबीब कहता है, "मैं अगर इस समय लेट आ रहा हूं, सोया रहूं, तो मेरा प्रतिद्वंदी कहीं तो होगा इस दुनिया में, जो उस समय प्रैक्टिस कर रहा है, और वह मेरे आगे चले जाएगा।" इफ यू सीक कंफर्ट, य यर सीट विल बी ओवरटेकन। तुम्हारी सीट कोई ले लेगा। हम यहां इस समय भोग विलास में यदि डूबे हैं और यह सो रहे हैं, हम यह क्यों नहीं सोच पाते? इस समय कोई तो ऐसी आत्मा होगी, जो योग कर रही है, तपस्या कर रही है। और हम क्या कर रहे हैं? इसलिए कम से कम वहां का छोड़ो। पर यहां तीन दिन आए हैं, तो लक्ष्य रखना है 12 से 14 घंटा टोक का या उससे भी ज्यादा। य कंफर्ट्स कॉफिन से। कंफर्ट्स आर कॉफिन। कॉफिन अर्थात व डेड बॉडी को, जिसमें रखते हैं ना ताबूत। वो यह मार्ग कटीला मार्ग है, काटो भरा मार्ग है। पर जो पहले पहले दिन, जैसे कोई जिम में जाता है और पहले दिन देखता है सबको और खुद मेहनत करता है, वजन वगैरह उठाता है, इतना शरीर दर्द करता है रात भर, दूसरे दिन सोचता है, "अब नहीं जाऊंगा।" पर उसके साथी उसे बताते हैं, "यही दर्द का इलाज है। दर्द जाते रहो। दर्द का इलाज है। दर्द अभी यहां दर्द हो रहा है ना? दूसरे दिन फिर जाओ। पूरे शरीर में दर्द होगा। डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ पेन। अब पूरे शरीर में दर्द हो रहा है, तो इधर का कम हो जाएगा।" इसलिए शरीर पर भी काम करना है, शरीर को भी मजबूत बनाना है, शरीर को भी स्वस्थ बनाना है। और उसके लिए भी यह जो सुविधाएं हैं, "मुझे यह चाहिए, मुझे एसी चाहिए, मुझे वह चाहिए, और पानी ही गर्म चाहिए।" शरीर को तपाना है। मैं यही खाऊंगा और मैं वही खाऊंगा। एक बहन हमारे ओपड़ी में आई थी, उसके बैग में एक वह था चटनी, तीखी तीखी। इधर का भोजन उसको बहुत फीका लगता है। बराबर पांच दिनों के लिए, 24 घंटे इमरजेंसी में कहीं गया, इधर उधर, तो साथ में चाहिए। जब तक तीखा नहीं खाते, मजा नहीं आता है। तीखा चाहिए। ऐसे जब तक नहीं करते, ऐसा लगता ही नहीं कुछ खाया। कंफर्ट्स, कंफर्ट्स, कंफर्ट्स। शरीर को तपाना है, तो कंफर्ट्स को थोड़ा ठोकर मारनी पड़ेगी। यहां हम सुविधाओं के लिए नहीं आए हैं, तप करने आए हैं। पिकनिक के लिए नहीं आए हैं, तप करने आए हैं। केवल क्लासेस सुनने के लिए नहीं आए हैं, तप करने आए हैं। इसलिए थोड़ी बहुत असुविधा हो गई, तो उसके तरफ ध्यान नहीं देना है। कंफर्ट्स।
४. चौथा धन। धन भी एक मृग मरीचिका है। व्यक्ति पागल हो जाता है धन के पीछे। उसको लगता है, "धन कमाऊ, कमाऊ, कमाऊ, और बाबा के यज्ञ में लगाऊं।" यह ब्राह्मणों की बात कर रहे हैं। परंतु ऐसा धन, जो परमात्मा याद में कमाया नहीं है, वह भगवान के यज्ञ में लगता नहीं है। ऐसा धन, जिसके पीछे लालच है, ऐसा धन, जिसमें किसी गरीब का शोषण हुआ है, वह परमात्मा कार्य में नहीं लगता। इसलिए सीमा खींचनी है। यह नीड है या ग्रीड? यह धन आवश्यकता है या लोभ? यहां भी भी जॉब, वहां पर भी जॉब, इधर भी काम, उधर भी काम। अगर अच्छा पुरुषार्थ करना है, तो टाइम चाहिए। अगर स्वयं को इतना उलझा दिया है विस्तार में, सुबह से लेकर रात तक, दो घंटा ट्रेवल, दो घंटा आने में जाने में, आठ घंटा ड्यूटी, और फिर थके आ रहे आते हैं, धड़ाम से लेट जाते हैं और टीवी देखते हैं, मोबाइल देखते हैं, रील्स, शॉर्ट्स, नींद। यह चल रहा है। इसको कैसे रोके, वह पता नहीं। रुकता ही नहीं। सेम, सेम, सेम, सेम, सेम, सेम। रोकने की कोशिश भी की। जैसे साइकिल होती है, पैडल मारना बंद कर दो, फिर भी वह कुछ देर अपने आप चलते रहता है। अपने आप। इसके लिए बड़ा धैर्य चाहिए। कोई भी आदत, कोई भी एडिक्शन, कोई भी व्यसन, दिनचर्या से भी चिपकाव है हमारा। हमारी यही दिनचर्या है। इसको हम बदलेंगे नहीं। इसलिए यहां बैठकर उस दिनचर्या को देखना है और सोचना है, कैसे उसको बदलूं, कौन से परिवर्तन लाने हैं। धन।
५. डिजिटल माया
उसके बाद है अगला डिजिटल माया। और यह सबसे बड़ी माया है। वर्तमान समय सबसे बड़ी। घंटों, घंटों रैंडम ब्राउजिंग। यह ऐप खोला, वह ऐप खोला। चैटिंग, कॉलिंग, वीडियो कॉलिंग। य सबसे बड़ा एडिक्शन। कंसंट्रेशन इस समय बहुत, बहुत कम है। लौकिक में भी बहुत कम, क्योंकि सबका अटेंशन स्पैन बहुत कम हो गया है। इसलिए हमको लगता है, यह देखूं तो सुख मिलेगा। कॉमेडी, कॉमेडी, कॉमेडियन, स्टैंड अप कॉमेडियंस, शोज, इंटरव्यूज, पॉडकास्ट, इन्फ्लुएंस, यूट्यूब। ढेर है, भरमार मोटिवेशनल स्पीकर्स भरा पड़ा है। बाबा ने एक मुरली में कहा था, "वह एक्टर संसार के हंसा सकते हैं, रुला सकते हैं, पर अशरीरी नहीं बना सकते।" और हम क्या कर रहे हैं? अपना टाइम दे रहे हैं, देखते रहे। सीरियल्स एक जबरदस्त ट्रैप है। वह खुद डिसाइड करना पड़ेगा। डिजिटल वेलनेस एक बर्निंग टॉपिक है। उसमें बहुत सारी चीजें। एटलीस्ट सुबह उठते ही ना देखो। रात को सोने से पहले एक घंटा पहले उसको बंद कर दो या स्विच ऑफ कर दो, या फिर ऑफलाइन हो जाओ। देखते-देखते ना सोओ, क्योंकि जो देखते-देखते सोएंगे, फिर नींद नहीं आती। फिर 10, 11, 12 बज जाते हैं, फिर बेचैनी होती है। और उस बेचैनी को दूर करने के लिए और देखते हैं, और बेचैनी होती है। सोने की कोशिश करते हैं, फिर नींद नहीं आती है। फिर देखते हैं, कुछ तो देखते हैं। वह क्या देखना है, वह पता नहीं। आज की ही मुरली में ब्रह्मा कुमार सो शूद्र कुमार बीच में है। क्लिक। इसलिए यह सोचना कि यह देखने से मुझे सुख मिलेगा, यह मृग तृष्णा है। उसमें सुख है ही नहीं। भ्रम है। व हां, यदि हम अपना निर्धारित कर रहे कि अगर देखना भी है, तो बहुत हो सके, तो ऑडियो सुनना ज्यादा अच्छा है देखने से। क्योंकि वर्तमान इस सृष्टि को अगर अभी संगम युग में, पोस्ट कोविड काल जो है, उसमें यह बहुत ज्यादा बढ़ गया है। पहले इतना नहीं था। कोविड के बाद से यह य टीचर्स कोचिंग सब ऑनलाइन ही हो रहा है। अच्छा भी है, एक रीति से फायदे भी उसके बहुत हैं। पर हम कैसे उसका यूज करते हैं? कहीं उसके गुलाम तो नहीं हो गए हैं? वह है प्रश्न।
6. अगला मनोरंजन।
मनोरंजन में ढेर सारी चीजें आती हैं। बाबा ने कहा है, "ज्ञान पिकनिक करो।" पिकनिक में जाते तो हैं, खेलकूद करते सब कुछ, पर थके हारे आ जाते हैं। क्योंकि देह भान जागृत हो जाता है। उसमें ज्ञान की चर्चा नहीं होती, ज्ञान की बातें नहीं होती। केवल खेलपाल होता है। संसार के सारे मनोरंजन, शॉपिंग, ऑनलाइन शॉपिंग, ऑनलाइन गेम्स। गेम्स के पीछे भी कितने पागल हैं। अगर हम कोई क्रिकेट मैच ही देख रहे हैं और उसी समय शरीर छूट गया, किसकी याद में छूटा? और एक एक्साइटमेंट में बुद्धि कहां गई है? गेम्स की तरफ। बुद्धि कहां गई है? पॉलिटिक्स की तरफ। इसने यह कहा, उसने यह कहा, इसने यह बयान दिया। अब ये सारे चैनल्स इसके बारे में क्या कह रहे हैं? वह भी एक भयंकर एडिक्शन है। न्यूज, मीडिया, शॉपिंग। यह एक ऐसे ट्रैप है, इतने सूक्ष्म कि अंडरग्राउंड चल रहे हैं, ऊपर से नहीं दिखा रहे कुछ। दे आर गोइंग ऑन। कितने सारे पेशेंट्स हमारे पास आते हैं, नींद ही नहीं आती है। क्या करते हैं? अंधेरे में मोबाइल देखते रहते हैं। कहां से नींद आएगी फिर? व ब्लू लाइट निकलते रहता है। स्टिमुलेटिव लाइट कहता है, "अभी दिन है।" 11 बजे अंधेरा कमरा, खिड़कियां, दरवाजे बंद, हाथ में मोबाइल। रामायण तो नहीं देखेंगे। यह सारे मनोरंजन, चीप मनोरंजन। योग सबसे बड़ा मनोरंजन है। ज्ञान ही सबसे बड़ा मनोरंजन है। पर ज्ञान उब आ गई है उससे। सुन सुन के, सुन सुन के, सुन वही वही शब्द रोज रोज। उसमें नवीनता लानी है, उसमें कुछ नया ढूंढना है।
७. अगला है फेम, अर्थात प्रसिद्धि।
सब मुझे जाने, सब हमें जाने, सबको पता चल जाए। यह कैसी इच्छा है? यही मृग तृष्णा। ऐसा लगता है, उसमें बहुत सुख है। पर वह बेचैनी की अवस्था है। विदेश का एक संत लिखता है अपनी जीवन कहानी में, "मुझे बहुत इच्छा थी कि बहुत प्रसिद्ध हो जाऊं और अब हो चुका हूं।" लोग चलने नहीं देते रास्ते पर, कपड़े फाड़ देते। हाथ लगाने दो, केवल हाथ लगाने दो। पकड़ पकड़ के घरों में ले जाते अपने। मेरा जीवन दुभर हो गया है। पहले ही ठीक था जब अनजान था। कुछ करने ही नहीं देते। और उसमें हम बाह्य मुखी रहते हैं, खो जाते हैं।
८. अगला फैशन, सुंदर दिखने की इच्छा।
कोई खराब इच्छा नहीं है, अच्छी इच्छा है। पर उसके लिए इतना सब करते हैं कि बात मत पूछो। उसमें ढेर सारी बातें हैं। कपड़ों से लेकर कली मुरली में था ना, "तुम वनवाह में हो।" अच्छा खाऊं, अच्छा पहनूं। रावण की दलदल। तुम्हें तो दूसरों को निकालना है। खुद ही फंसे हैं तो कैसे निकालेंगे? फैशन, फैशन, फैशन। हमेशा हम उदाहरण देते हैं। विनोबा भावे का ट्रेन से जा रहे थे। एक महिला थी, गजरा पहने हुए। वह उससे पूछते, "क्या यह गजरा तुमको दिखता है? " वह कहती है, "ना।" तो क्यों पहना है? क्यों पहना है? दिखाने के लिए। कुछ दिन पहले मुरलियों में था, "काले हैं तो ही अच्छा है, नहीं तो पंजा मारेंगे।" आया था ना, अभी साकार मुरली। फैशन, फैशन, फैशन। हेवी फैशन। और उस चक्कर में कितने सारे पेशेंट्स बीच में आए थे। वह डाय भी लगाया था। सब एलर्जिक रिएक्शन हो गई थी। भयंकर। दो-तीन दिन भरती थे। एक माता कुछ ना कुछ नए प्रयोग करते रहते। यह जड़ीबूटी, यह लगाऊं, वह लगाऊं। कितना घिसो ग इस चेहरे को। काला ही रहे। आत्मा।
9 अगला है भोजन।
सुबह से लेकर रात तक भोजन का ही चिंतन। भोजन संबंधी चर्चा। क्या खाऊं? किधर क्या बना है? इधर क्या है, उधर क्या है? यह खाऊं, वह खाऊं, वह खाऊं, वह खाऊं। क्या-क्या खाऊं? लाइक्स, डिसलाइक्स। यह मेरे पसंद का है, यह मेरे पसंद का नहीं। यह मुझे सूट होता है, यह मुझे सूट नहीं होता है। और जितना व्यक्ति को चाहिए, उससे तो कई गुना अधिक ही खा रहा है। और जितना वह खाता है, उतना दिमाग सुन। क्योंकि इतनी उसकी आवश्यकता ही नहीं है। और बीमारियां वह अलग। व्हाट वी आर ईटिंग। उसी से आयुर्वेद में लिखा है, जो हम खाते हैं, उसके तीन भाग होते हैं। पहला मल, दूसरा शरीर, और तीसरा मन। जैसा अन्न, वैसा मन नहीं। जो अन्न, वही मन। इक्वल है। उसमें उत्तेजनाएं हैं, उसमें गरिष्ठ है। मसाले, तेल, तीखा, नमक, तेल। मन भी ऐसा उत्तेजित रहेगा निरंतर। उस पर इंडिविजुअल प्रयत्न करने हैं। हर एक ने ढूंढना है, क्या किया जाए जिससे शरीर स्वस्थ रहे, आलस ना रहे, और उत्तेजनाओं से मुक्ति हो जाए। जितना हम उत्तेजना वाला डालेंगे, उतना ब्रह्मचर्य कठिन है। फिर नहीं हो सकता है। मन शांत और भारीपन अलग। और पेट की समस्याएं डालते ही रहते हैं, डालते ही रहते हैं, डालते ही रहते हैं। सुबह से लेकर शाम तक। बस में पैसेंजर खाली चढ़ रहे हैं, उतरने का नाम नहीं। उतरने वाले उतरना चाहते, पर चढ़ने वाले चढ़ने दे तो उतरे। इसलिए कब्ज, कॉन्स्टिपेशन सबसे बड़ी बीमारी है संसार की। शरीर को एक्टिविटी चाहिए। एनर्जी, एक्सरसाइज, या वॉकिंग, या कुछ नहीं। तो सब रिपोर्ट्स कुछ ना कुछ, कुछ ना कुछ गड़बड़। तो क्या बताया? भोजन।
१०. अगला घूमना फिरना, साइड सीइंग।
इधर जाऊं, उधर जाऊं, यह देखूं, वह देखूं। हो सकता है वहां जाऊं, तो वहां ज्यादा सुख है। हमेशा हमको यह लगता है, जहां हम रहते हैं, वहां सुख नहीं है। सुख कहां है? दूसरी जगह। दूर के ढोल हमेशा सुहावने लगते हैं। द ग्रास इज ग्रीनर ऑन द अदर साइड। पर यह हम भूल जाते हैं, जहां हम हैं, वहां एक रावण है। और जहां जाएंगे, वहां 10 है। ऐसा सोचते हैं, इनसे छूटो। वहां जाओ, तो अच्छा होगा। परंतु जहां है, वहां का रावण फिर भी परिचित रावण है। नई जगह जाओगे, वहां स्ट्रेंजर रावण मिलेंगे। इसलिए यह इच्छा भी हटा देनी। यह भी एक मृग तृष्णा है। इधर घूमू, उधर घूमू, उधर जाऊं, उधर जाऊं। यह करूं, वह करूं। साधना एकांत में होती है और एक जगह पर होती है। हां, सेवार्थ जा रहे हैं, गए और आ गए। चिपकना नहीं है। स्थान से भी चिपका हो जाता है। यही ठीक है, यही रहना है। आज यहां, कल वहां, कल वहां। फ्लो
तो कितनी पॉइंट्स हो गई? टोटल 10। सबसे पहला संबंध, अपने संबंधों को चेक करना है। दूसरा, यह शरीर। इस शरीर की सच्चाई को जानना है कि जो इतना सुंदर दिखाई दे रहा है और जो हमको लगता है, इतना सुंदर है, वह वैसा है नहीं। अंदर मल मूत्र भरा हुआ है, गंदगी से भरा हुआ है। केवल गंदगी ही गंदगी है। व मर्चरी में जाकर देखो, डेड बॉडी रखी रहती है ना। सड़ांध, बदबू आती है उसकी। उसको तो व्यक्ति भी नहीं कहा जाता, बॉडी कहते हैं उसको। आत्मा निकल जाने के बाद क्या कहा जाता है? बॉडी को इधर लो, बॉडी को उधर लो। ऐसा कहते हैं ना। तीसरा, सुविधाएं। सुविधाओं में आकर्षण, सुविधाओं में चिपकाओ। यह भ्रम है। चौथा, धन। भाइयों के लिए विशेषकर देखना है कि हम जो भाग रहे हैं, पागलों जैसे, क्या करेंगे? इतना सारा कर लिया, इतना सारा कमा लिया। और जब मृत्यु आएगी, धरा के धरा रह जाएगा। इस धरा का, इस धरा पर सब कुछ धरा के धरा रह जाएगा। कुछ भी नहीं जाएगा। परमधाम अकेले निकल जाएंगे। अगला, डिजिटल। डिजिटल रिलेशनशिप चेक करना है। मेरा मोबाइल के साथ क्या रिलेशन है? एप्स के साथ क्या रिलेशन है? ट के साथ क्या रिलेशन है? और यह य, उसके साथ क्या संबंध है? स्क्रीन टाइम कितना है?
मनोरंजन चाहिए। मनोरंजन। यह मनोरंजन की चाह क्यों है? क्योंकि भीतर खालीपन है, रिक्त है। भीतर वीरानी सी छाई है। इसीलिए चाहिए, कुछ करूं, कुछ मिले, कुछ तो एंटरटेनमेंट हो जीवन में। इतना खालीपन आ गया है। और जिसके जो एंटरटेनमेंट हम खोजते हैं, उसमें और खालीपन बढ़ता है। लोग मूवी देखने जाते हैं, सोचते हैं, इससे खालीपन भरेगा। भरता है क्या? घूमने फिरने जाते हैं, भरता है क्या? बिल्कुल नहीं भरता है। और ही खाली होकर आते हैं। आत्मा अनंत है और अनंत की प्यास केवल अनंत ही मिटा सकता है। केवल वह अनंत परमात्मा ही आत्मा की तृप्ति कर सकता है। और इस संसार का कुछ भी नहीं। आत्मा प्यासी है, तो प्रभु प्रेम से के लिए। और प्रभु प्रेम के अतिरिक्त आत्मा को कुछ भी नहीं भर सकता। उसे प्यास है केवल मिलन की, परमात्मा से मिलन की। वह मिलन आत्मा शरीर के तल पर ढूंढता है। और शरीर के तल पर मिलन उसे केवल दुख, पश्चाताप, आत्मग्लानि, दर्द, विस्तार, बंधन, जंजाल में फंसा देता है। अगला, प्रसिद्धि। प्रसिद्ध हो जाऊं, तो शायद सुख मिले। पर उसमें कितनी बेचैनी समाई हुई है। बेचैनी है। उसको मेंटेन करके रखने में तो और ज्यादा बेचैनी है। लोगों को पता चले, उसमें मैं का भी विस्तार हो रहा है कि मैं हूं। यहां अध्यात्म का लक्ष्य है, मैं को गिरा देना। यहां मैं पुष्ट होता है। अगला, फैशन। देखना है, हमारा पहनावा कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम आकर्षित कर रहे हैं किसी को। अगला, भोजन। अपने भोजन पर तो हर एक को कार्य करना है। यह ऐसा एक टॉपिक है। अगर इसको आपने ठीक कर दिया, तो शरीर स्वस्थ हो जाएगा, निरोगी हो जाएगा, शक्तिशाली हो जाएगा, लचीला हो जाएगा। और जो कंचन काया, कल्प तरु काया, उसका अनुभव यहां होगा। डबल लाइट, वेटलेसनेस का अनुभव। और जो बीमारियां हैं और इतनी सारी कटोरे भर के दवाइयां, उससे मुक्ति होगी। अगर इसको अच्छे से समझ लिया, तो अगला, घूमना फिरना, साइड सीइंग। इधर जाऊं, उधर जाऊं, यह देखूं, वह देखूं। अभी एक जगह से आए, आने के बाद कहां जाना है, उसकी प्लानिंग। फिर वहां से आए, फिर कहां जाना है, उसकी प्लानिंग। और जाते भी हैं, जिस जगह। रविंद्रनाथ टैगोर ने लिखा है, "मैं अपने एक मित्र के साथ था भारत में। वह मित्र आया था स्विट्जरलैंड से। हम दोनों एक तालाब था, उसमें नौका विहार कर रहे थे। और जितना समय हम लोग तालाब में थे, एक दो घंटा नौका विहार जब कर रहे थे, बोटिंग, मेरा मित्र स्विट्जरलैंड की लेक्स के बारे में बता रहा था। वह जहां से आया, हमारे स्विट्जरलैंड में ऐसा ऐसा है। और जब नाव, नौका विहार पूरा हुआ, तो रविंद्रनाथ टैगोर से वह कहता है, "हां, आपकी नौका विहार बहुत अच्छा है।" उन्होंने कहा, रविंद्रनाथ जी ने कि, "तुम यहां थे ही नहीं, तुम वहां थे। लोग आते हैं माउंट अबू में साइड सीइंग करने। कैसे साइड सीइंग करते? जाते हैं सेल्फी, फोटो, फटाफट चलो। अगर प्रकृति का आनंद लेना है, तो बैठो प्रकृति के सानिध्य में, देखो डूबते हुए सूरज को और उठते हुए सूरज को। वह तो देखना ही नहीं है। क्या करना है? फोटो, फोटो, फोटो लेना है। बस उस स्थान से तो कोई लेना देना ही नहीं है। और फोटो लेकर क्या करना है? भेजना है 50 फोटो। अब ऐसा करो, यह तुम्हारी सजा है। हमारे सारे फोटो देखो, क्योंकि हमने तुम्हारे देखे थे। स्टेटस, हम यहां हैं। और जो बेचारे देखते हैं, वह सोचते हैं, "हम कब जाएंगे? " अनुभव सुनाते हैं, "हम विदेश की यात्रा करके आए। बाबा की हमने यह सेवा की और वह सेवा की और ऐसा सेवा की।" और जो सुनने वाले सोचते हैं, "मैं कब जाऊंगा? " और दुखी होता है। कितने हो गए? 10।
पेन, पेंसिल सब नीचे रख देंगे। और स्वयं को अत्यंत मौन और अत्यंत एकांत में स्थिर कर दो। सभी स्थिर। अंग से अंग ना लगे, दूर-दूर बैठ जाएंगे। जो नीचे बैठ सकते हैं, वह सामने आकर नीचे भी बैठ सकते हैं। शरीर, शरीर से ना लगे। अगले 15-20 मिनट सभी हलचल को समाप्त कर देंगे। सबसे पहली हलचल शरीर की। केवल एक ही अवस्था में, एक ही मुद्रा में शरीर को स्थिर कर दो। कुछ समय के लिए आंखें बंद करके अपने जीवन की यात्रा को देखेंगे। वहां से, जहां से चालू की, उस घर से जहां जन्म लिया था। वह गांव, वह शहर, वह लौकिक घर, मात-पिता, भाई-बहन। इस संगम युग में जो आत्मा ने जीवन की शुरुआत की, कहां से की, उस अतीत के बिंदु तक पहुंच जाएंगे। और तब से लेकर अब तक क्या-क्या हुआ । जैसे स्क्रीन पर कोई मूवी चल रही है, एक मेंटल मूवी। अपने ही जीवन की, अपनी ही यात्रा को, अपने ही मन की आंखों से देखेंगे। अकेला मैं , इस जन्म के मात-पिता, इस जन्म के भाई-बहन। पता नहीं, किसी और जन्म में यह कौन थे। इस जन्म का पति-पत्नी, बच्चे, रिश्तेदार। पता नहीं, किसी और जन्म में यह सब कौन और कहां थे। जन-जन की अधूरी कहानियां संगम पर पूरी हो रही हैं। जन-जन के हिसाब चुकते हो रहे हैं। अपने जीवन की संपूर्ण यात्रा को विस्तार से देखेंगे। वह स्कूल, वह कॉलेज, जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएं , समर्पण, सेवा केंद्र या शादी , ससुराल, नया घर या करियर, जॉब। जो जिसकी यात्रा है, जैसी जिसकी यात्रा है, वैसे। आगे बढ़ते-बढ़ते उस स्थान, उस बिंदु तक पहुंचेंगे, जहां हम वर्तमान में हैं। वर्तमान जो घर है, सेवा केंद्र है, गीता पाठशाला है, ऑफिस है। अपना कमरा देखेंगे, जहां हम रहते हैं। जिन लोगों के साथ रहते हैं, वह लोगों को देखेंगे। तटस्थ भाव, साक्षी भाव। त्रिकुटी के मध्य विराजमान मैं, ज्योतिर्मय आत्मा हूं। इस संसार से उड़कर तत्वों के पार, आसमान को चीरती सूक्ष्म वतन में बाप-दादा सम्मुख हैं। और बाबा को अपने दिल की वह बात बतानी है, जो आज तक किसी को नहीं बताई। संपूर्ण समर्पण। इस ब्राह्मण जीवन में जो भी अपराध हुए, पाप हुए, श्रीमत की अवहेलना, उल्लंघन हुआ, उसके लिए मन ही मन बाबा से माफी मांगे। अंतःकरण को स्वच्छ करना है। और वह होगा पश्चाताप से। अनुभव करो, बाबा ने अपना वर्धस्त मेरे सिर पर रख दिया है। और तिलक दे रहे हैं विजय भाव का, सफलता मूर्त का , निर्विघ्न भाव का। अब अनुभव करो, मधुबन में बाबा की कुटिया में, मैं बाबा की गोद में सो रहा हूं। निश्चिंत , कब से भाग रहा था, मेरी थकान दूर हो गई। हाथ-पैर रिलैक्स। अनुभव करो, हिस्ट्री हॉल में मैं खड़ा हूं और सभी दादियों का वरदानी हस्त मेरे सिर पर है। चाहे मैंने अब तक जो कुछ किया, आज से एक नई शुरुआत, एक नया जीवन। सारे मोह, सारे भ्रम-जाल दूर हुए। ना किसी संबंध का आकर्षण, ना इस देह का, ना सुविधाओं का, ना धन का , ना डिजिटल संसार का , ना मनोरंजन, ना कोई प्रसिद्धि, फैशन, भोजन या घूमना-फिरना । एक प्रभु प्रेम। वापस त्रिकुटी के मध्य विराजमान मैं आत्मा चेतना को स्थिर कर दूं। आंखें खोलते हुए सामने से बाबा से दृष्टि लेंगे। परमात्मा दृष्टि मेरे हर संकल्प पर पड़ रही है। मेरा हर विचार उस तक पहुंच रहा है। मुझे सत्य की ओर आना है। संपूर्ण होश और संपूर्ण जागरण। इस शून्य के पानी को मैंने देख लिया। निरर्थक, व्यर्थ है। चेतना जगी है फिर से। तृष्णा का हर घूंट जहर है। सच्चा सुख , सच्चा मनोरंजन , सच्ची प्राप्ति , सच्चा संबंध केवल एक से है। बाबा, केवल एक से प्यार, एक के प्रति समर्पण भाव , एक की याद, एक की सेवा, एक का साथ , एक ही छत्रछाया, एक बल, एक भरोसा। एक ही सब कुछ, एक में ही सब कुछ । बाबा , एक तू ही। पूर्ण समर्पण। निर्भार अवस्था, निर्बोझ स्मृति।