Patrapushp August 2026


मधुबन ओम् शान्ति

ज्योति बिन्दु स्वरूप पत्र-पुष्प निमित्त टीचर्स तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण परिवार प्रति मधुर यादपत्र

" सम्पूर्ण पावन बनने के लिए अपवित्रता के बीज को भी समाप्त करो "

परम पवित्र, प्राणप्यारे अव्यक्त बापदादा के अति लाडले, मन-वचन-कर्म से शुद्धता वा पवित्रता को अपनाने वाले, “पवित्र भव, योगी भव” की वरदानी आत्मायें निमित्त टीचर्स बहिनें तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण कुल भूषण बाबा के नूरे रत्न, ईश्वरीय मधुर याद के साथ रक्षाबंधन के पावन पर्व की सबको बहुत-बहुत बधाई हो । यह अगस्त मास हम सबकी अति प्यारी, दादी प्रकाशमणि जी का पुण्य स्मृति मास है। दादी जी जैसे सदा कौमर्य रह, कुमारका नाम से प्रसिद्ध हुई । पवित्रता की देवी बन अनेक आत्माओं को पवित्र और योगी बनाया, ऐसे इस रक्षा बंधन के पावन पर्व पर सभी ब्रह्मा वत्सों को सम्पूर्ण पावन बनने की दृढ़ प्रतिज्ञा करनी है, इसके लिए अपवित्रता के बीज (व्यर्थ संकल्पों) को भी समाप्त करना है। साथ-साथ राखी का यह पावन पर्व सेवा का भी बहुत अच्छा अवसर देता है। हमारी पवित्र बहिनें अनेक आत्माओं को स्नेह भरा रक्षा-सूत्र बांधकर सबको पतित-पावन परमात्मा का परिचय देती तथा आने वाली पावन दुनिया की खुशखबरी सुनाती हैं। मीठे बापदादा ने हम बच्चों को पवित्रता की गुह्यतम परिभाषा सुनाते हुए विशेष इशारा दिया है बच्चे, अब संकल्प से भी व्यर्थ को समाप्त करो। व्यर्थ संकल्प ही अपवित्रता का बीज है। मन में अगर व्यर्थ संकल्प चलते हैं तो भी हम मनमनाभव नहीं रह सकते, इसलिए योग की ज्वाला में अब व्यर्थ संकल्पों की अशुद्धि को समाप्त कर सम्पूर्ण पावन बनना है। जब हम सभी एक बाबा दूसरा न कोई, ऐसे एकव्रता बन बाबा के प्यार में सदा समाये रहेंगे तब संकल्प व स्वप्न से भी अपवित्रता का अंशमात्र समाप्त होगा। हम सच्चे ब्राह्मणों की धारणा का गायन है - 'प्राण जाएं पर धर्म न जाए।' तो अपने इस पवित्रता के धर्म अर्थात् धारणा के प्रति कुछ भी त्याग करना पड़े, सहन करना पड़े, सामना करना पड़े, साहस रखना पड़े तो खुशी-खुशी से करना है, इसमें पीछे नहीं हटना है क्योंकि यह सम्पूर्ण पवित्रता ही हम ब्राह्मणों का श्रेष्ठ श्रृंगार है। हमें इस श्रृंगार को धारण कर, सदा पवित्र स्वरूप में स्थित रह बेहद की स्टेज पर हीरो पार्ट बजाना है ब्रह्मा बाप और शिव बाप की विशेष पसन्दगी “पवित्रता' के व्रत को जब हम सम्पूर्ण रूप से पालन करते हैं तब बापदादा से सुख स्वरूप, शान्त स्वरूप और मन की सन्तुष्टता का वर्सा प्राप्त होता है । हमारी सेवाओं में सफलता का आधार भी ‘“पवित्रता’” है। हमारे संकल्प वा बोल में और कोई भी भाव मिक्स नहीं हो। भाव में भी पवित्रता, भावना में भी पवित्रता हो। ऐसे नहीं सोचना है कि मैं ब्रह्मचारी तो रहता हूँ, पवित्र तो हूँ ही, सिर्फ इसमें खुश नहीं होना है लेकिन अपने संकल्पों को भी शुद्ध बनाना है। ज्ञान स्वरूप और शक्ति स्वरूप बनना है क्योंकि इस पवित्रता के बल से ही यह प्रकृति के तत्व पावन बनेंगे, विश्व परिवर्तन का कार्य सम्पन्न होगा। तो बोलो, ऐसा अटेन्शन रख अपनी पवित्र मन्सा द्वारा प्रकृति सहित सर्व आत्माओं को सकाश देने की सेवा कर रहे हो ना! अच्छा - रक्षाबंधन के पुनीत पावन पर्व की सबको पुनः कोटि-कोटि बधाईयां । ईश्वरीय सेवा में, मोहिनी मुख्य प्रशासिका, ब्रह्माकुमारीज़

 


ये अव्यक्त इशारे अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो


1) सम्पूर्ण पवित्रता के हिसाब से व्यर्थ संकल्प भी अपवित्रता । है उतनी ब्राह्मण जीवन की पर्सनैलिटी है। अगर पवित्रता का बीज है । व्यर्थ संकल्प चलना, मैजारिटी बच्चों में अभी , यह संस्कार रहा हुआ है। व्यर्थ संकल्प का आधार मन है, जो मनमनाभव होने नहीं देता इसलिए श्रीमत रूपी लगाम टाइट कर व्यर्थ संकल्पों की अपवित्रता को खत्म करो ।

2) दृढ़ता सफलता की चाबी है। सफलता आप बच्चों का जन्म सिद्ध अधिकार है, इसलिए दृढ़ता को यूज़ करो, अलबेले नहीं बनो, हो जायेगा, कर लेंगे.. यह नहीं सोचो। दृढ़ संकल्प से मन के व्यर्थ संकल्पों को समाप्त कर विजयी बनो ।

3) बापदादा का मुख्य फरमान है निरन्तर याद में रहो और मन, वाणी, कर्म से पवित्र बनो । संकल्प में भी अपवित्रता वा अशुद्धता न हो – इसको कहते हैं सम्पूर्ण पवित्र। संकल्प में भी अगर पुराने अशुद्ध संस्कार टच करते हैं, व्यर्थ संकल्प चलते हैं या स्वप्न आते हैं तो भी सम्पूर्ण पवित्र नहीं कहेंगे इसलिए पवित्र भव व योगी भव के पहले पाठ को स्वप में लाओ तब ही बाप समान और बाप के समीप आने के अधिकारी बन सकते हो ।

4) अगर बुद्धि में अशुद्ध संकल्प वा पुराने संस्कार संकल्प रूप में भी टच होते हैं तो सम्पूर्ण वैष्णव नहीं कहेंगे। जैसे कोई अकर्तव्य कार्य देखता भी है तो देखने का असर हो जाता है, उसका भी हिसाब बन जाता है। इस हिसाब सोचो तो पुराने संस्कार व अशुद्ध संकल्प बुद्धि में अगर टच होते हैं तो भी सम्पूर्ण वैष्णव वा सम्पूर्ण पवित्र कैसे कहेंगे ।

5) आप आत्मायें ब्राह्मण जीवन में ऐसे पवित्र बनते हो जो शरीर भी, प्रकृति भी पवित्र बना देते हो इसलिए शरीर भी पवित्र है तो आत्मा भी पवित्र है । सम्पूर्ण पवित्र अर्थात् अपवित्रता का अंश-मात्र भी न हो क्योंकि जितनी पवित्रता कम तो पर्सनैलिटी कम । ये प्योरिटी की पर्सनैलिटी सेवा में भी सहज सफलता दिलायेगी।

6) पवित्रता और अपवित्रता का कारण है स्मृति | जब स्मृति रहती है कि यह देवी है तो स्मृति, दृष्टि और वृत्ति को पवित्र बनाती है और स्मृति है कि यह फीमेल है तो वह स्मृति, वृत्ति और दृष्टि को अपवित्रता की तरफ खैंचती है। वहाँ रूप को देखेंगे और वहाँ रूहानियत को देखेंगे।

7) अगर कोई भी अपवित्रता वृत्ति, स्मृति वा संकल्प में है तो ब्राह्मण - पन की स्थिति में स्थित नहीं हो सकते इसलिए कदम-कदम पर सावधान रहो । विशेषताओं के साथ अगर कोई एक भी कमजोरी है तो एक कमजोरी अनेक विशेषताओं को समाप्त कर देती है ।

8) कोई भी विकर्म वा व्यर्थ कर्म अगर बार-बार हो जाते हैं तो इसका कारण है कि सदा साथी को साथ में नहीं रखते हो अथवा साथ का अनुभव नहीं करते हो । जैसे शक्तियां एक सेकण्ड की दृष्टि से असुर संघार करती हैं, ऐसे कम्बाइन्ड रूप की स्मृति से अपने आसुरी संस्कार वा अपवित्रता के संकल्पों को सेकण्ड में संघार करो।

9) जैसे छुईमुई का पौधा जरा भी हाथ लगाने से शक्तिहीन हो जाता है, उसमें टाइम नहीं लगता। ऐसे आप एक सेकण्ड के शुद्ध संकल्प की शक्ति से माया को छुईमुई मुआफिक मूर्छित कर दो। अपना निजी स्वरूप, वरदानी- स्वरूप, सदा ही स्मृति में रहे तो अपवित्रता वा विस्मृति का नामोनिशान भी न रहे।

10) मैं संगमयुगी ब्राह्मण हूँ, यह व्यर्थ संकल्प, अपवित्रता के संस्कार शूद्र के संस्कार व स्वरूप हैं। ऐसा अनुभव हो कि यह अपवित्रता और विस्मृति के संस्कार, जो मेरे अर्थात् ब्राह्मणपन के नहीं लेकिन शूद्रपन के हैं, उनको । मेरा समझते हो तो माया के वश होकर परेशान होते हो।

11) जब अपवित्रता अर्थात् काम महाशत्रु स्वप्न वा संकल्प में भी वार न करे तब कहेंगे डबल अहिंसक । सदा भाई- भाई की स्मृति सहज और स्वतः स्मृति स्वरूप में रहे। कभी अपनी सम्पूर्ण सतोप्रधान स्टेज से नीचे गिरकर अपना घात नहीं करना। आत्मा के असली गुण-स्वरूप और शक्ति- स्वरूप स्थिति से नीचे आना अर्थात विस्मृत होना, यह भी पाप के खाते में जमा होता है।

12) संकल्प व स्वप्न में भी जब अपवित्रता का अंशमात्र न हो तब कहेंगे सच्चे ब्राह्मण, इसी धारणा के लिए ही गायन है 'प्राण जाएं पर धर्म न जाए।' ऐसी हिम्मत, ऐसा दृढ़ निश्चय करने वाले किसी भी प्रकार की परिस्थिति में अपने धर्म अर्थात् धारणा के प्रति कुछ भी त्याग करना पड़े, सहन करना पड़े, सामना करना पड़े, साहस रखना पड़े तो खुशी-खुशी से करते हैं, पीछे नहीं हटते।

13 ) सम्पूर्ण पवित्रता अर्थात् मन्सा में भी किसी एक विकार का अंश भी न हो । ज्ञान, गुण और सर्व शक्तियों की प्राप्ति में सदा सम्पन्न, सर्व प्राप्तियों के लाइट का क्राउन स्पष्ट दिखाई दे। स्वयं को सदा लाइट आत्मिक रूप में अनुभव करे। कर्म में भी अपने को लाइट (हल्का) महसूस करे ।

14) सम्पूर्ण पवित्रता आप ब्राह्मणों का श्रृंगार है, सदा श्रृंगार की हुई मूर्त अर्थात् सदा पवित्र स्वरूप में स्थित रह बेहद की स्टेज पर हीरो पार्ट बजाओ। सदा ब्रह्मचारी अर्थात् संकल्प में भी किसी प्रकार की अपवित्रता वृत्ति को चंचल नहीं बनाये । वृत्ति की चंचलता भी रजिस्टर को दागी बना देती है - इसलिए वृत्ति से भी सदा ब्रह्मचारी बनो ।

15) जैसे आपका आदि स्वरूप पवित्र देवता है, ऐसे यह अन्तिम जन्म भी पवित्र ब्राह्मण जीवन है, इस स्मृति के आधार पर पवित्र जीवन अति सहज अनुभव करो । पवित्र बनो, योगी बनो - यही महामन्त्र सर्व प्राप्तियों की चाबी है। , अगर पवित्रता नहीं, योगी जीवन नहीं तो अधिकारी होते हुए भी अधिकार की अनुभूति नहीं कर सकेंगे। यह महामन्त्र ही सर्व खजानों के अनुभूति की चाबी है।

16 ) आप होलीहंस बच्चों का आहार भी शुद्ध, व्यवहार भी शुद्ध, अशुद्धि का नाम निशान भी न हो क्योंकि शुद्ध दुनिया में जा रहे हो जहाँ अपवित्रता वा अशुद्धि का नामनिशान नहीं है। जब ऐसे होलीहंस बनते हो तब भविष्य में हिज होलीनेस कहलाते हो।

17) अगर ब्राह्मण जीवन में संकल्प में भी अपवित्रता वा अमर्यादा आ जाती है तो तख्तनशीन की बजाए गिरती कला में अर्थात नीचे आ जाते हो। कोई विकर्म नहीं हुआ लेकिन व्यर्थ कर्म भी हुआ तो पश्चाताप के बजाए महसूसता की स्टेज होती है । महसूस होता है कि यह राँग है, नहीं होना चाहिए. वह बात काँटे के समान चुभती रहेगी, इसलिए इस व्यर्थ से भी मुक्त बनो ।

18) ईश्वरीय सेवा का बड़े से बड़ा पुण्य है - पवित्रता का दान देना। पवित्र बनना और बनाना ही पुण्य आत्मा बनना है क्योंकि किसी आत्मा को आत्मघात महा पाप से छुड़ाते हो। अपवित्रता आत्मघात है। पवित्रता जीयदान है।

19) पवित्रता आप ब्राह्मण आत्माओं का अनादि आदि संस्कार है, इस नैचुरल संस्कार से स्वप्न व संकल्प में भी अपवित्रता इमर्ज न हो । संकल्प आवे और विजयी बनो, इनसे भी ऊपर नैचुरल संस्कार बना लो। तो इस सबजेक्ट में पुरुषार्थ करने की आवश्यकता नहीं रहेगी।

20) संगमयुग पर बापदादा ने सभी बच्चों को पहला व्रत दिया है - "सम्पूर्ण पवित्र भव" । यह पवित्रता का व्रत सिर्फ ब्रह्मचर्य का व्रत नहीं है लेकिन ब्रह्मा बाप समान हर बोल में पवित्रता का वायब्रेशन समाया हुआ हो। हर संकल्प में पवित्रता का महत्व हो । हर कर्म में, कर्मयोगी जीवन का अनुभव हो - इसको कहा जाता है ब्रह्मचारी सो ब्रह्माचारी ।

21 ) पवित्रता ही महानता है, यही योगी जीवन का आधार है। जरा भी अंशमात्र संकल्प में भी किसी प्रकार की अपवित्रता है तो जहाँ अपवित्रता का अंश है वहाँ पवित्र बाप की याद जो है, जैसा है वैसे नहीं आ सकती इसलिए मन्सा में भी अपवित्रता के अंश को समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ बनो। सदा यही स्मृति रहे कि मैं पूज्य आत्मा इस शरीर रूपी मन्दिर में विराजमान हूँ।

22) ब्राह्मण जीवन का जो आन्तरिक वर्सा सदा सुख स्वरूप, शान्त स्वरूप, मन की सन्तुष्टता है, उसका अनुभव करने के लिए मन्सा की पवित्रता चाहिए। जमा करने की विधि है - मन्सा, वाचा, कर्मणा पवित्रता । फाउन्डेशन पवित्रता है। सेवा में सफलता का आधार भी पवित्रता है। संकल्प वा बोल में और कोई भी भाव मिक्स नहीं हो । भाव में भी पवित्रता, भावना में भी पवित्रता हो ।

23) ब्रह्मा बाप और शिव बाप की विशेष पसन्दगी है ही पवित्रता। लेकिन पवित्रता की परिभाषा बहुत श्रेष्ठ और गुह्य है। पवित्रता जहाँ होगी वहाँ निश्चय, सच्चाई - सफाई, ये सब आ जाता है। सम्पूर्ण पवित्रता का अर्थ ही है स्वप्नमात्र भी अपवित्रता मन और बुद्धि को टच नहीं करे, इसी को ही कहा जाता है सच्चे वैष्णव ।

24) पवित्रता का रहस्य प्रैक्टिकल में लाना अर्थात् संकल्प रूप से भी पांचों विकारों पर विजयी बनना। व्यर्थ संकल्प क्रोध भी पैदा करता है तो काम अर्थात् किसी आत्मा के प्रति अगर व्यर्थ दृष्टि भी जाती है तो उस समय पवित्रता नहीं मानी जायेगी। तो यह व्यर्थ संकल्प बाप के प्यार के पीछे न्योछावर करो ।

25) पवित्रता फाउण्डेशन है और फाउण्डेशन का ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना ये कॉमन बात है लेकिन अभी आगे बढ़े हो तो बचपन की स्टेज नहीं है, अभी तो वानप्रस्थ स्थिति में जाना है। मैं ब्रह्मचारी तो रहता हूँ, पवित्रता तो है ही, सिर्फ इसमें खुश नहीं हो जाओ। मूल फाउण्डेशन अपने संकल्प को शुद्ध बनाओ, ज्ञान स्वरूप बनाओ, शक्ति स्वरूप बनाओ।

26) बाप के साथ आप सबने भी पान का बीड़ा उठाया है कि पवित्रता द्वारा हम प्रकृति को भी पावन करेंगे। तो ये संकल्प पूरा करने के लिए बापदादा चाहते हैं कि विश्व का हर एक बच्चा पहले लगाव मुक्त बने - चाहे साधनों से, चाहे व्यक्ति से । साधनों को यूज़ करना और चीज़ है, लगाव अलग चीज़ है । तो बापदादा हर बच्चे को पहले लगावमुक्त बनाना चाहते हैं ।

27 ) परमात्म ज्ञान की नवीनता पवित्रता है। फ़लक से कहते हो ना कि आग कपूस इकट्ठा रहते भी आग नहीं लग सकती। आप लोग भाषणों में भी कहते हो कि पवित्रता के बिना योगी तू आत्मा, ज्ञानी तू आत्मा बन ही नहीं सकते । तो यह चैलेन्ज अब प्रैक्टिकल रूप में लाओ।

28) अगर पवित्रता का नियम पक्का है तो लगाव मुक्त, ईर्ष्या और क्रोध से भी मुक्त बनो । चिड़चिड़ापन भी न हो । यह भी लगाव नहीं रखो कि यह होना ही चाहिए । स्वार्थ या ईर्ष्या के वश कोई बात कहेंगे और वह पूरी नहीं होगी तो क्रोध पैदा होगा इसलिए पवित्रता के पिल्लर को पक्का करो तो यह पिल्लर लाइट हाउस का काम करेगा।

29) सम्पूर्ण सत्यता भी पवित्रता के आधार पर होती है। पवित्रता नहीं तो सदा सत्यता रह नहीं सकती है। सिर्फ काम विकार अपवित्रता नहीं है. लेकिन उसके और भी साथी हैं। तो महान् पवित्र अर्थात् अपवित्रता का नाम- निशान न हो।

30) पवित्रता की शमा सदा श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ जलती रहे, ज़रा भी हलचल में नहीं आये, अचल | जितनी अचल पवित्रता की शमा होगी उतना सहज सभी बाप को पहचान सकेंगे और पवित्रता की जयजयकार होगी। पवित्रता की पर्सनालिटी को सदा इमर्ज रूप में स्मृति में रखो। स्मृति ही समर्थी का आधार है और जहाँ समर्थी है वहाँ माया आ नहीं सकती। समर्थ आत्मा के पास माया का आना असम्भव है।

31 ) पवित्रता की निशानी है - स्वच्छता, सत्यता । अगर सारे दिन में चाहे उठने में, चाहे बैठने में, चाहे बोलने में, चाहे सेवा करने में, चाहे स्थूल सेवा की वा सूक्ष्म सेवा की लेकिन अगर विधिपूर्वक नहीं की, विधि में भी अगर ज़रा-सा अन्तर रह गया तो वो भी स्वच्छता अर्थात् पवित्रता नहीं है। अपवित्रता सिर्फ किसको दुःख देना या पाप कर्म करना नहीं है लेकिन स्वयं में सत्यता, स्वच्छता विधिपूर्वक अगर अनुभव करते हो तो पवित्र हो ।


दादी प्रकाशमणि जी की विशेषतायें दादी जानकी जी के मुखारबिन्दु से

“दादी जी के समान प्रभावमुक्त बनना, न किसी के प्रभाव में आना, न अपना प्रभाव डालना (27-08-2007)


1) मीठी-मीठी दादी के लिए हर एक के दिल का आवाज है - सबसे न्यारी और सबकी प्यारी । बाबा के हम सब बच्चे हैं, पर हमारी दादी सबसे न्यारी, सबसे प्यारी बाप समान। पहले हमको बाबा कहता था आप समान बनाओ, अव्यक्त होकर कहा बाप समान बनो। तो आप समान बनाने में दादी बहुत होशियार थी। मैं ही बनूं, नहीं, मेरे समान बनें। परन्तु बाप समान बनने में नम्बरवन गई। इतना हर बात में न्यारा और प्यारा, न्यारा बनने के बिगर प्यारा नहीं बन सकते, प्यारा बनने बिगर न्यारा नहीं दिखाई पड़ता ।

2) दादी जी ने यही लक्ष्य रखा कि मुझे किसी के बुरे व अच्छे प्रभाव में नहीं आना है। न किसी पर अपना प्रभाव डालना है, किसी के प्रभाव में आना है। यह सूक्ष्म अति प्यार से दादी का वरदान वा गिफ्ट ले लो। प्रभाव मुक्त बन जाओ।

3) दादी ने सच्ची दिल से साहेब को अपना बनाके रखा । ईश्वरीय परिवार के संगठन की शक्ति को बढ़ाया। बाबा बाबा है, मम्मा है, पर इतनी जो वृद्धि हुई है, दादी जी इतना वृद्धि करने के निमित्त बनी है, संगठन की शक्ति को स्वमान में रहकर सम्मान देकर आगे बढ़ाया है। सतयुगी दुनिया कैसी स्नेह सम्पन्न, सुख शान्ति सम्पन्न होगी, वह दादी ने यहाँ करके दिखाया है। मम्मा

4) दादी जी ने यज्ञ सेवा में सबको साथी बनाकर स्नेह से, यज्ञ के फाउण्डेशन को मजबूत बना दिया। जैसे कल बाबा ने कहा वृक्ष के तने आप हो, आप के ऊपर सारा झाड खड़ा है। जैसे बाबा ग्रेट ग्रेट ग्रैण्ड फादर है, ऐसे हम भी ग्रेट हैं । अन्दर से पानी पत्तों को मिलता है। हम सबको अनुभव करने का भाग्य मिला है। भाग्यवान हैं जिन्होंने दादी के संग, दादी की पालना ली है। हमारे रग-रग में बाबा की शिक्षायें, समझानी और सावधानी दादी ने भर दी है।

5) तो मीठी दादी की याद में, प्यार में श्रद्धा भाव से सच्चा बनने का व्रत ले लो। सच्चा बनना है तो कैसे बनना है, उसके बिगर तात लात और कोई बात न हो। तात अन्दर की, लात लगन, बात मुख की। तो मैं प्यारी मीठी दादी की याद में अपने भाई बहिनों को कहती हूँ - अपनी घोट तो नशा चढ़े, जो ओटे सो अर्जुन, करना है तो अब कर ले, तीन बातें याद रखना। मुझे करना है, जो ओटे सो अर्जुन, हर एक कर सकता है। अपनी घोट, जो ज्ञान बाबा देता है उसका मनन चिंतन करके, ज्ञान का सिमरण करके, सिमरणी में आने के लिए स्मृति स्वरूप बनने का ध्यान रखना है। - " सिमरणी में आना है तो ज्ञान के सिमरण से व्यर्थ से फ्री होना है

6) ज्ञान बल, योग बल, जो सेवा में काम आता है। बल जो जमा होता है उससे धारणा हो जाती है। धारणा का प्रभाव जल्दी पड़ता है। समझने की इच्छा पीछे पैदा होती है। संबंध में आये, प्राप्ति हुई तो लगता है यह मेरे काम की बात है। दिल कहती है यही सुनना है, यही समझना है, यही जीवन में लाना है। बाबा का एक-एक बोल अनमोल है। बाबा के बोल का मूल्य कथन नहीं कर सकते हैं। बाबा का एक-एक बोल मुझे याद आता है। जो बाप की महिमा है उसमें आप समान बनाने चाहता है। जैसे दादी को बनाया, ऐसे हम सबको भी बनना है।

7) जैसे अभी मीठी दादी ने अपना रूप बदल करके, साकारी रूप से अव्यक्त हो करके, बापदादा के साथ इकट्ठा इशारे दे रही है। दादी जी से सबका प्यार और रिगार्ड है। प्यार उसको ही कहा जाता है जब दिल में रिगार्ड हो।

8) हमारी पढ़ाई है ही टेन्शन फ्री रहने के लिए। टेन्शन फ्री रहने की पढ़ाई है, उसके लिए हम रोज़ दादी के कितने गुण वर्णन करें। सभी ने दादी को अच्छी तरह से देखा है। हम सिर्फ सावधान रहें, इतना बाबा ने समझाया है, सिखाया है। सावधानी की सीढ़ी पर चढ़ते चलें, सावधानी की सीढ़ी है, चढे सो उतरे पार । चढ़ेंगे तो उतरेंगे, यहाँ नहीं उतरेंगे, पार चले जायेंगे। परमधाम निवासी होकर रहेंगे। शान्तिधाम में बहुत थोड़ा समय रहते हैं क्योंकि कर्मयोगी हैं। पवित्रता शान्ति में लेकर जाती है । शान्ति से सुखमय राज्य स्थापन करने में बाबा के मददगार बनते हैं।

9) आजकल बाबा कहता है याद रखो मुझे घर चलना है। सारा दिन देखें, अपने आपको चेक करें मैं घर जाने के लिए तैयारी कर रही हूँ, जा रही हूँ या पहुंचकर बाबा के नजदीक रहती हूँ । घर के पास हैं, माना बाबा के पास हैं। तो पास होने का सर्टीफिकेट बाबा देता है। एक तरफ पवित्रता, योग युक्त बनने में बहुत मदद करती है। साकार में मीठे बाबा के यह बोल हैं, पवित्रता से योग, योग से बल जो मिलता है वह कमाल का काम करता है। पहले तो हमारे विकर्म सारे विनाश हो जाते हैं और कोई हिसाब- किताब किसके साथ न रहे, पुराना तो चुक्तू, अभी भी किस साथ कोई हिसाब-किताब नहीं । कर्मबन्धन का हिसाब-किताब जुड़ता है तो तोड़ना मुश्किल हो जाता है । यह तोड़-जोड़ का धन्धा टाइम वेस्ट करता है।

10) सतयुग के लिए पुण्य कर्म, श्रेष्ठ कर्म करें और योगी भी रहें, सतयुग में जाने के लिए अति श्रेष्ठ कर्म की लिस्ट हमारे पास हो। दादी प्रैक्टिकल हमारे सामने पालना के निमित्त बनी, पढ़ाई पर सबका ध्यान खिंचवाया। मुरली से इतना प्यार, मुरली कितनी बार पढ़ती और सबको सुनाती । फिर बाबा के साथ पूरा कनेक्शन। जब कनेक्शन बाबा से है, तो आटोमेटिक लाइट बन जाते हैं और माइट अपने आप काम करती है, सेवा में भी सर्वशक्तिवान की शक्ति काम करती है। सर्वशक्तिवान हमारा बाबा है, कहता है मेरा काम मैं जानूं, तू अपना काम कर। तुम सिर्फ सतयुगी राजाई करने के लायक बनो ।

11) दादी पवित्रता की देवी थी। पवित्रता के योगबल से उन्होंने स्वयं में सर्वशक्तियां धारण की। इसी से सभी विकार भी खत्म हो गये, अवगुण भी चले गये। तो हम सब भी दादी के समान ऐसा इन्स्ट्रुमेंट बनें जो बाबा मेरे को निमित्त बनाकर आपेही सेवा कराये। सेवा के चिंतन में भी माया घुसती है। चिंता कोई नहीं है लेकिन चिंतन में माया कैसे आती है, वह अच्छी तरह चेक करना पड़े। अपने आपको शुभ श्रेष्ठ चिंतन में रखना, बाकी सबके लिए शुभचिंतक रहना, हर एक का जिम्मेवार बाबा है, हम बहन भाई हैं।

12) आज बाबा ने कहा तुम शान्ति में कहाँ तक रहेंगे क्योंकि तुम कर्म और योगी हो । योगयुक्त रहने से जो तुम्हारे द्वारा कर्म होगा उनको देख और करेंगे तो दुआयें मिलेंगी। हमारे ऐसे कर्म हों जो सब दुआ देवें। एक हॉबी हो दुआओं का खजाना इकट्ठा करने की। ज्ञान का खजाना मिला है, गुणों को यूज़ करें, गुणवान बनें, किसका अवगुण न देखें, न चित्त पर रखें।

13) एक हैं माया के तूफान, दूसरे हैं माया के विघ्न, तीसरी है माया की ग्रहचारी। दादी के लिए जो बाबा ने कहा सदा निर्विघ्न रही है, निर्विकल्प रही है, निर्मल स्वभाव रखा है। यह तो हम सबने आंखों से देखा है। निर्विकल्प और निर्विघ्न, निर्विकल्प बड़ी समाधि है। निर्विकल्प, जरा भी कभी कोई विकल्प न आये। अभी सिर्फ याद करेंगे या प्रैक्टिकल करके दिखायेंगे। तो ऐसा पुरुषार्थ करके सफलता मूर्त बनने के लिए दादी याद आयेगी। जैसे दादी सफलता मूर्त रही है, ऐसे हम भी सफलता का सितारा बन जायें।

14) दादी चमकने वाला सितारा बनी, प्रकाशमणि । हम सफलता का सितारा तो बन जायें, मन वचन कर्म श्रेष्ठ हो, सफल हो, हम कितनी मन की दिल की बातें सुनायें, क्योंकि हमारा बहन भाईयों से परिवार से बहुत प्यार है और क्या बोलें । यही बोल जो बाबा ने सिखाये हैं, हम दादी के साथ रहकर जो सीखे हैं, वह अपने इस जीवन द्वारा साकार करेंगे।

15) साकारी रूप में हम सब बाबा की प्रेरणाओं को जीवन में ऐसे लायें जो हमारा निमित्त पार्ट अनेक आत्माओं को अच्छा करने के लिए प्रेरणा दे । किसकी ग्रहचारी या विघ्न हट जाये, संकल्प में शुद्धि श्रेष्ठता का सहयोग मिल जाए। यह सूक्ष्म सच्ची दिल से सेवा करने वाले को बाबा कितना साथ देता है, दिया है वह भी अनुभवी जाने।

16) दादी ने फॉलो फादर, सी फादर किया है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण अपनी जीवन से दिखाया है। तो हमको भी अभी वही करना है, जैसे दादी ने करके दिखाया है। मीठे बाबा ने तो क्या पुरुषार्थ करना है, कैसे पुरुषार्थ करना है वो सब बताया है, बताते ही रहते हैं। जैसे ईश्वरीय सन्तान हूँ, ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण हूँ, यह नशा हो। परमात्मा बाप तो ऊंचे ते ऊंचा है, उसकी मैं सन्तान हूँ। तो जो बाबा हमें सुनाता है, वही करना है। इससे समय, संकल्प स्वत: ही सफल होते हैं क्योंकि संगम का एक सेकण्ड भी एक वर्ष के बराबर है। अगर एक सेकण्ड भी असफल हुआ तो बहुत नुकसान हो जायेगा, तो यह कमाई करने का समय है। संगमयुग की स्मृति जो है वो बाबा और घर की याद दिलाती है, जिससे बहुत कमाल और कमाई कर सकते हैं। अपने पास और कुछ नहीं है तो कोई हर्जा नहीं, पर संगम पर संकल्प से समय तो सफल कर सकते हैं। और कुछ न करें सिर्फ बाबा को नकल तो करें ।

17) बाबा मम्मा ने जैसे डायरेक्शन पर चलाया, उसी अनुसार दादी ने किया। तो सदा सुखी वो रहे हैं जो हाँ जी कहते हैं। अन्दर से अपने से सूक्ष्म सच्चा प्यार है तो बाबा की बातें प्यार स्वीकर करना, यह ऑटोमेटिक होती हैं। जो बाबा और दादी से पाया है उसका गायन सभी दिल से करते हैं। दादियों ने बाबा को दिल में रखा है तभी दादी ऐसे बनी है। बाकी ऐसे ही कोई कहे मैं दादा, दादी बनूँ तो नहीं बन सकता। तो दादी से प्रैक्टिकली प्यार है तो अपने को प्यार करो और दिल से दुआयें स्वीकार करो ।

18) कईयों को कोई-न-कोई प्रकार का दुःख अन्दर बैठ गया है, वह दुःख दुआ को यूज़ करने नहीं देता है। दादी को सभी इसलिए प्यार करते हैं कि दादी ने कभी किसी को दुःख नहीं दिया है और लिया भी कभी नहीं है । अन्दर थोड़ा भी दुःख है तो वो सबकुछ होते भी सुखी होने नहीं देगा। जो सदा सन्तुष्ट है वो सदा प्रसन्न है। यह बातें बड़े प्यार से अपने आपको समझा करके सम्पन्न बना लेवें।

19) गुणग्राही बनने में बड़ा सुख है। किसी का अवगुण न देखो, सोचो भी नहीं तो सुखी हैं। जिस घड़ी जिसका अवगुण देखा, सोचा तो वो हमें दुःखी बनाता है। तो अगर दादी को प्यार का रिटर्न देना है तो प्लीज़ कभी दुःख नहीं लेना। बाबा से जो वरदान मिले हैं वही हमारी सूरत मूरत में हों। मुरली में रोज़ जो वरदान मिलते हैं उसको भी अगर हम दिल में रखें तो भी हम ब्राह्मणों की शक्ल देवताओं से भी अच्छी दिखाई देने लगेगी।

20) बाबा कहते हैं ज्ञान देना सहज है परन्तु सर्वशक्तिवान बाबा से जो शक्ति पाई है, वो देना बहुत बड़ी बात है क्योंकि कई आत्माओं को सूक्ष्म शक्ति की जरुरत है। दोनों बाप हमको अपने से भी ऊंचा बनाते हैं, इतनी ऊंची बातें दिल में धारण करें तो कितना बाबा का प्यार मिलेगा, वही शक्ति का काम करेगा। दादी के लिए आता है कि जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा...।

21) बाबा जो कहता है वही करना है। जो बाबा ने किया है, वही करना है। चलना-फिरना, उठना-बैठना... इसमें न कोई अपना विचार, न कोई संस्कार... । समझ से निश्चय का बल अगर है तो कोई क्वेश्चन नहीं उठ सकता है। जरा सा भी क्यों क्या है तो समथिंग रांग है। ड्रामा की हर सीन में कल्याण समाया हुआ है इसलिए बुद्धि जरा भी हलचल में न आये, तो ऐसे अटल विश्वास वाले बाबा के बच्चे अचल अडोल स्थिति से सदा सच्चे सेवाधारी होते हैं। वे कभी कोई परिस्थिति से परेशान नहीं होते ।

22) भावना में कुछ गड़बड़ है तो नुकसान अपने को ही है। देने वाला दे रहा है, लेने वाले को सिर्फ स्वच्छ बुद्धि से लेना है। तो भगवान के महावाक्यों को स्वच्छ बुद्धि से धारण करना। अगर बुद्धि स्वच्छ नहीं है तो अन्दर ज्ञान जाता ही नहीं है। इसमें देने वाले दाता का दोष नहीं है, लेने वाले का है क्योंकि इतना अक्ल नहीं है जो मलीन बुद्धि की सफाई करे क्योंकि जरा सा भी मैलापन है, तो भगवान का प्यार नहीं मिल सकता । तो जो बाबा ने मुख से बोल उच्चारण किये हैं वही दादी ने किया और कराया है इसलिए हम सब सुखी हैं।

23) स्वच्छता और सच्चाई ब्राह्मणों की शान है। स्वच्छता तन मन को हेल्दी बनाती है। हेल्दी माइन्ड है तो हेल्दी बॉडी है और सम्बन्ध में भी जहाँ भी जिसके साथ भी रहो वहाँ वो खुश है। वह अपने और दूसरों के स्वभाव - संस्कार को जानते हुए सबके साथ मिल करके चलते हैं। वह न्यारे और सदा स्वच्छ हैं, जिसकी आकर्षण से लोग कहेंगे यह दिल के बड़े साफ हैं, सरल हैं। कारोबार में सच्चे हैं। तो भगवान की इतनी मेहरबानी है जो इतना दिया है, मंगता से दाता बना दिया। अच्छा।


दादी प्रकाशमणि जी के अमृत वचन " सच्चाई सफाई की गुह्य परिभाषा "

1) सच्चाई और सफाई इन दोनों शब्दों का बहुत गुह्य अर्थ है। एक तो मैं सत्य परमात्मा पिता के सत्य ज्ञान के पथ पर हूँ इसलिए मैं सत्य हूँ। एक है सत माना अविनाशी, दूसरा सत्य माना सच्ची हूँ। फिर है सफाई - सफाई, जैसे घर में कोई किचड़ा न हो तो कहते बहुत सफाई है। दूसरा है मेरे दिल में कोई भी व्यर्थ किचड़ा नहीं हो। माना न मेरे में इमप्युरिटी का किचड़ा हो, न झूठ- चोरी या ठगी का किचड़ा हो। ऐसे स्वभाव, संस्कारों का भी मेरे में कोई गंद न हो। किसी प्रकार की झरमुई झगमुई, व्यर्थ व परचिंतन का भी मेरे में किचड़ा न हो। दूसरों के प्रति दोष दृष्टि रख देखना, दोष दृष्टि रख दोष से व्यवहार करना, खुद को निर्दोषी और दूसरों को दोषी बनाना यह भी सफाई नहीं है। जिसमें खुद का देह अंहकार होगा वह कभी भी दिल का साफ नहीं होगा। उसके अन्दर अभिमान का नशा होगा। और सच्चाई वाला सदा निर्मान होगा। जिसमें निर्मानता नहीं है, अन्डरस्टुड है कि उसके अन्दर देह अभिमान है, देह अभिमान है माना वह साफ नहीं है, उसके अन्दर दूसरों के प्रति दोष दृष्टि रहती । साफ दिल वाला अपनी गलतियों की करेक्शन करेगा, रियलाइज करेगा। कई बार कईयों - पत्र पुष्प अगस्त 2026, अंक - 409 , को रांग राइट की भी रियलाइजेशन नहीं होती। समझाओ तो भी समझेंगे नहीं । रियलाइज नहीं करेंगे कि मैं किस बात में रांग हूँ या किस बात में राइट हूँ। तो यह रियलाइजेशन की शक्ति भी दिल की सफाई से आती है। जो एक सेकण्ड में रियलाइज कर लेते हैं उसे करेक्शन करना भी सहज हो जाता है। दूसरे के कहने से पहले वह खुद को ही रियलाइज कर परिवर्तन कर लेते हैं।

2) सच्चाई वाला, साफ दिल वाला कभी किसके संगदोष में नहीं आता। संग का दोष लगता ही उसे है जो साफ दिल नहीं है। जहाँ साफ दिल नहीं है वहाँ जरूर कोई खोट है, झूठ है। तो वह संगदोष में जल्दी आ जायेगा। जैसे सोना है वह साफ है, सच्चा है तो उसकी वैल्यु है और जब उसमें जब झूठ अर्थात् अलाए पड़ जाती है तो उसकी वैल्यु चली जाती। उसको कहेंगे मिक्स सोना। तो यह संगदोष भी हमारी स्थिति को बहुत खराब करता है। एक दूसरे की सच्ची लगन को तोड़ता है। बाबा से लगन तभी टूटती है जब लाइन क्लीयर नहीं है । फिर संग का दोष लग जाता है और जहाँ संग का दोष लगा वहाँ निश्चय बुद्धि के बदले संशय जरूर पैदा होगा। संशय भी अनेक प्रकार का है। एक संशय है जो मैं मानती ही नहीं कि बाबा कौन है। एक सूक्ष्म संशय है जो श्रीमत का उल्लंघन करते। मर्यादा उल्लघन करता ही वह है जिसकी दिल में सच्चाई सफाई नहीं है । जिसे बाबा के साथ का अनुभव नहीं है। बाबा साथ है तो कोई कैसी भी कठिन बात भी आये उसे वह सहज पार कर लेता है, जिसके लिए कहा जाता सच की नांव हिले बहुत पर डूबे नहीं। सच्ची दिल वाला परमात्मा को ही साथ बना लेता और उनके साथ ही रहता है । उनके लिए कितनी भी कोई कठिनाई आवे, वह सहज पार कर लेता है। वह कभी दूसरे के संग में नहीं आता। तो पहले चाहिए बुद्धि की सच्चाई और सफाई, तब ही कनेक्शन राइट होगा। -

3) कई कहते हैं हमें योग का अथवा बाबा से सर्व संबंधों का अनुभव नहीं होता या मैं बाबा की शक्ति का स्वयं में अनुभव नहीं करती – मैं कमजोर हूँ तो इन सबका कारण है कि बाबा से सच्चे दिल की लगन नहीं है। बाबा से लाइन क्लीयर नहीं है अथवा बाबा जो है जैसा है, ऐसा यथार्थ जाना नहीं, पहचाना नहीं। अगर बाबा जो है जैसा है मैंने पहचाना तो मेरे में इतनी लगन वा शक्ति भी होगी। तो पहले अपना कनेक्शन देखना है कि मेरे में कोई देह अभिमान तो नहीं है? मेरे पर किसी के संगदोष का असर तो नहीं होता है? मेरे में किसी भी बात के कारण कभी संशय उत्पन्न तो नहीं होता? ऐसे अनेक बातों से खुद को चेक करना है। 4) हमारा फाइनल पेपर है स्मृर्तिलब्धा नष्टोमोहा लेकिन इस पेपर में वही पास होता है जो सच्ची साफ दिल वाला है। जिसकी नज़रों में सदा एक परमात्मा बाप ही दिखाई पड़ता है। कई बार यह जो आता कि यह मेरे सम्बन्धी, मेरी प्रापर्टी, मेरी योग्यता... यह मैं मेरा भी बहुत नुकसान करता है। जहाँ मैं है वहाँ निर्मानता आ नहीं सकती। वह नव-निर्माण का कार्य कर नहीं सकते। और जिनमें निर्मानता नहीं वे न तो दिलपसन्द रहते, न लोकपसन्द बन सकते और न ही उन्हें प्रभू पसन्द का सर्टीफिकेट मिलता । सच्चाई वाला प्रभू पसन्द है। सच्ची दिल वाला प्रभू का प्यारा है और जो प्रभू का प्यारा है उसे प्रभू की दुआयें एक की दस गुणा मिलती हैं । प्रभू से एक प्यार करे तो प्रभू 100 गुणा प्यार देता है। यह अनुभव प्रैक्टिकल होना चाहिए। बाकी कहाँ तक हर एक करता वह अपनी स्थिति को देखे कि मुझे उस पिता परमात्मा से एक का 10 गुणा, 100 गुणा रिटर्न मिलता है? संकल्प करूं एक, रिटर्न मिले बाबा की मदद के अनेक । बाबा वक्त पर पेपर भी लेता लेकिन उनको यह अनुभव होगा कितने भी विघ्न क्यों न आये। स्थितियों के आयें, बीमारियों के आयें, लौकिक आयें, अलौकिक आयें या सेवाओं के, संस्कारों के आयें । परन्तु जहाँ बाबा बैठा है वहाँ बाबा की अनेक प्रकार से मदद मिलती है। बाबा के यह महावाक्य कि बच्चे सच्ची दिल पर साहेब राज़ी, यह हमें हर कदम पर अनुभव हो। अनुभव होता है तो कनेक्शन ठीक है। अनुभव नहीं होता तो जरूर कहाँ मेरी बुद्धि के अन्दर कांटा है। जब बुद्धि क्लीयर नहीं होगी तो कहाँ इधर-उधर जरूर भटकेगी। तो चेक करना है मेरी बुद्धि कहाँ भटकती तो नहीं है?

5) ऐसे जो स्मृति स्वरूप हैं वही नष्टोमोहा बनते हैं । उसी का नाम है सच्चे ट्रस्टी। तो चेक करो कि हम सब पक्के ट्रस्टी हैं? जो स्मृर्तिलब्धा होगा वह वैभवों के आधार पर स्थिति को नहीं खड़ा करेगा, वैभवों के आधार पर सेवा करूं, वैभवों के आधार पर मैं अपनी जीवन को निभाऊ, वैभवों के आधार पर मैं त्यागी रहूँ, तो वह त्यागी नहीं। वैभवों के आधार पर न स्थिति रखो, न सेवा रखो क्योंकि हम बेगर टू प्रिन्स हैं। बाबा ने हमें एकदम नया जन्म दिया, नया जन्म माना कि हमारा कुछ भी नहीं । यह स्मृति और फिर नष्टोमोहा की भी बहुत सूक्ष्म मंजिल है। कई बार हम दूसरों को तो ज्ञान देते कि हमें टेन्शन मुक्त रहना है लेकिन खुद टेन्शन वाले गृहस्थी बन जाते। कोई प्राबलम है, कोई सेवा है, कोई कार्य है आप बाबा की मदद से उसे हल करो। लेकिन चिन्तित हो करके, डर करके उसका हल करने से हल नहीं होगा। तो सच्ची दिल वाले बाबा के बच्चों की किसी भी व्यक्ति में, वस्तु व वैभव में, लौकिक व अलौकिक में, सेवाओं में .... किसी में भी अटैचमेंट नहीं होगी। इन सबसे मुक्त होने का साधन है कि आप उड़ता पंछी बनकर रहो। सदा उड़ती कला को अपने सामने रखो। लेकिन उड़ती कला के लिए पंख चाहिए। पंछी उड़ता तभी है जब उसके दो पंख है। तो हमारे भी दो पंख हैं उमंग और उल्हास । उमंग उल्हास होगा तो इतना दिल, रूचि से बाबा की याद में उड़ते रहेंगे। हमारी पहली सबजेक्ट है योग। तो योग से भी पूरी प्रीत चाहिए। दूसरा हमें ज्ञान की पढ़ाई का भी उमंग है। जिसे उमंग-उत्साह है वह ज्ञान की मुरली सुनते, मनन- चिंतन करते सदा ज्ञान दान करते रहेंगे। तो मुझे पढ़ाई से कितनी रूचि है, दिल है यह भी हमारे उमंग पर है। उमंग उल्हास होगा तो हमारी बुद्धि सेवा के लिए भी सदा इतनी ही चलती रहेगी और नये नये प्लैन, नये नये प्रकार की सेवाओं के कार्य में बुद्धि भागती रहेगी। तो स्व स्थिति के लिए भी हमको उमंग चाहिए। हमें इतनी ऊंची ऊंची अपनी स्व स्थिति बनानी है। इसके लिए बहुत रुचि चाहिए, दिल चाहिए, उमंग चाहिए। इतना ही फिर दूसरों के गुण उठाने की भी रूचि चाहिए। किसी में बहुत अच्छा ज्ञान मंथन करने का गुण है, तो मैं भी सीखूं। इसमें भी पहले उमंग होगा तो दूसरे से वह गुण सीख सकेंगे। इन सब बातों में भी सबसे पहला उमंग चाहिए कि मुझे कर्मातीत बनना है, दूसरी सब बातें छोड़ दो । यह है हमारा अन्तिम पुरुषार्थ | मुझे कर्मातीत जरूर बनना है। मेरी स्थिति में कोई विघ्न न हो। कोई पुराना स्वभाव न हो। अच्छा। ओम् शान्ति।