Patrapushp of June 2026

मधुबन ओम् शान्ति अंक 407 जून 2026


 

" अपनी नेचर को सरल व सहनशील बनाओ तो सदा हर्षित रहेंगे"

निमित्त टीचर्स तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण परिवार प्रति मधुर यादपत्र 20-05-26

 

प्राणप्यारे अव्यक्तमूर्त मात-पिता बापदादा के अति स्नेही, सदा अपनी रूहानी शान में रह माया के हर खेल को साक्षी हो देखने वाले, सदा हर्षित रह सर्व को आकर्षित करने वाली निमित्त टीचर्स बहिनें तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण कुल भूषण भाई बहिनें, ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद स्वीकार करना जी ।

- बाद समाचार - वर्तमान समय आप सब अपने-अपने स्थानों पर बहुत अच्छी तपस्या कर रहे होंगे। हर मास मधुबन से विशेष योग तपस्या के लिए होमवर्क भेजा जा रहा है। उसी प्रमाण सभी अपनी मन्सा शक्तियों से पूरे विश्व को सकाश देते हुए, अपनी श्रेष्ठ वृत्तियों द्वारा तमोगुणी वायुमण्डल को परिवर्तन करने की सेवा करते चलो। वर्तमान समय मधुबन बेहद घर में तो सभी स्थानों पर बहुत सुन्दर वैरायटी सेवायें चल रही हैं। एक ओर डबल लाइट योग साधना भट्ठी, दूसरी ओर विंग्स के कार्यक्रम तथा राजयोग शिविर .. समय प्रति समय यहाँ के शान्त, पवित्र और शक्तिशाली वायुमण्डल में अनेक आत्मायें आकरके खूब रिफ्रेश हो, नया उमंग-उत्साह लेकर जाती हैं, जबकि दुनिया में चारों ओर भय, चिंता और तनाव का वातावरण है, ऐसे समय पर मीठे बाबा ने अपने बेहद घर को तपस्या कुण्ड, शान्ति कुण्ड बनाया है, जहाँ सभी बहुत अच्छी अनुभूतियां करने के लिए भाग-भागकर पहुंच जाते हैं । यह जून मास तो हम सबकी मीठी मम्मा का मास है, विशेष मम्मा की साकार पालना लेने वाली आत्मायें उनके अंग-संग के बहुत अच्छे अनुभव सुनाती हैं। हमारी दादियों ने भी मम्मा की अनेक विशेषतायें सुनाई हैं, जो इस पत्र पुष्प में आपके पास भेजी जा रही हैं। मम्मा ने अपने जीवन से सभी को यही पाठ पढ़ाया कि हर घड़ी अन्तिम घड़ी है, सदा एवररेडी रहना है। बाबा की हर आज्ञा पर ‘“जी बाबा, हाँ जी " बाबा करके मम्मा नम्बरवन में चली गई, वे सदा कहती हुक्मी हुक्म चला रहा है.. । अभी हम सबको भी उन्हें फालो करते हुए, सेवाओं के साथ अपनी सम्पन्न और सम्पूर्ण स्थिति बनानी है । अभी तो प्यारे बापदादा का विशेष इशारा है कि बच्चे, अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो। सदा साक्षीपन की सीट पर सेट रह माया और प्रकृति के पपेटशो को मनोरंजन के रूप में देखने का अभ्यास करो। कोई भी सीन को देखकर क्यों, क्या, कैसे.. इस प्रकार के प्रश्नों में उलझना नहीं है। सरलता और सहनशीलता का गुण धारण कर अपनी अचल अडोल एकरस स्थिति बनानी है । बाबा कहते बच्चे, सदा खुश रहो और खुशी का खजाना बांटो। खुशी की लहर सर्व में फैलाओ, यही सच्ची सेवा है। दुनिया वाले जिस बात को आपदा समझते हैं, उसे आप खेल समझकर, सहनशीलता की शक्ति से मनोरंजन का अनुभव करो। अब अपनी वा दूसरों की बीती को न देख सेकण्ड में फुलस्टाप लगाने का अभ्यास करो। जो बात सुनी, देखी वा की वह बहुत सारयुक्त हो, हर बात के सार को देखेंगे तो सरलचित और सदा हर्षित रहेंगे। बोलो, ऐसे मधुर प्यार भरे अव्यक्त इशारों को स्वरूप में लाते हुए सदा एकरस स्थिति में रहने का अभ्यास कर रहे हो ना! अच्छा - सबको बहुत - बहुत याद ... ईश्वरीय सेवा में,

B K मोहिनी मुख्य प्रशासिका, ब्रह्माकुमारीज़

 


ये अव्यक्त इशारे

सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो


 

1) अपने इस चेहरे को सदैव हर्षित बनाना - यह संगमयुग की सबसे बड़ी गिफ्ट है। चेहरे पर कभी भी कोई परेशानी की रेखा न हो। जैसे सम्पूर्ण चन्द्रमा कितना सुन्दर लगता है, वैसे अपना चेहरा सदैव हर्षित रहे। चेहरा ऐसा चमकता हुआ हो जो और भी आप के चेहरे में अपना रूप देख सकें, इसके लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशीन बनो।


2) हर्षित रहने का गुण पुरुषार्थ में बहुत मददगार बन सकता है, लेकिन जैसे सूरत हर्षित रहती है वैसे आत्मा भी सदैव हर्षित रहे, इस नेचुरल गुण को आत्मा में लाना है। सदा हर्षित रहेंगे तो फिर माया की कोई आकर्षण आकर्षित नहीं करेगी, यह बाप की गैरन्टी है। लेकिन सदा हर्षित रहने के लिए अपनी रूहानी शान में रहना और सहनशील बन साक्षीदृष्टा हो माया के खेल को देखना।


3) सदा हर्षित रहना यह ज्ञान का गुण है, इसमें सिर्फ रूहानियत एड करना है। हर्षितपन का संस्कार भी एक वरदान है जो समय पर बहुत सहयोग देता है। जो स्वयं सदा हर्षित रहते हैं वह कैसे भी मन वाले को भी हर्षित कर देते हैं, इज़ी नेचर वाले अपने खुशनुमा हर्षित चेहरे से भारी वायुमण्डल को भी हल्का बना देते हैं।

4) सदा हर्षित रहने वालों का यादगार विष्णु के रूप में दिखाया है। विष्णु क्षीरसागर में आराम से लेटा हुआ ज्ञान का सिमरण कर हर्षित हो रहा है। तो हर्षित रहने का साधन है ज्ञान का सिमरण। जो जितना ज्ञान का सिमरण करते हैं वह उतना ही हर्षित रहते हैं । कोई भी परिस्थिति उनकी हिम्मत, उमंग-हुल्लास को कम नहीं कर सकती। वे सहनशीलता की शक्ति से हर परिस्थिति को सहज पार कर लेते हैं ।

 

5) दुनिया में लोग जिंदा होते भी नाउम्मीदी की चिता पर बैठे हुए हैं, ऐसी आत्माओं को मरजीवा बनाओ, नये जीवन का दान दो । अपने खुशनसीब, हर्षित मुख चेहरे द्वारा उन्हें मानव जीवन में जीना सिखाओ। आपको देखकर उनमें हिम्मत, उमंग-उत्साह आ जाये, इसके लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ और सदा कमल समान स्थिति के आसन पर डबल लाइट स्थिति में स्थित रहो।

 

6) इस बेहद की स्टेज पर मैं खिलाड़ी हूँ। यह खिलाड़ी की स्टेज सदा हर्षितमुख रहने का अनुभव कराती है। किसी भी प्रकार की कोई भी बात, जिसको दुनिया वाले आपदा समझते हैं लेकिन खिलाड़ी बन खेल करने वाले और साक्षी हो खेल देखने वाले, ऐसी आपदा के रूप को खेल समझ, सहनशीलता की शक्ति से मनोरंजन का अनुभव करते हैं। ,

 

7) जो अपनी वा दूसरों की बीती को नहीं देखते हैं, सेकण्ड में फुलस्टाप लगाते हैं वह सरलचित होते हैं और जो सरलचित होते हैं उनके नयनों से, मुख से चलन से मधुरता व हर्षितमुखता प्रत्यक्ष रूप में देखने में आती है। ऐसी सरलचित स्थिति वाले दूसरों को भी सरलचित बना देते हैं। सरलचित माना जो बात सुनी, देखी, की, वह सार युक्त हो और सार को ही उठाये।

 

8 ) जो सरलचित हैं वही सदा हर्षित रहते हैं। हर्षितचित हैं तो सबको आकर्षित करते हैं । हर्षित का अर्थ ही है अतीन्द्रिय सुख में झूमना। ज्ञान का सुमिरण करते, अव्यक्त स्थिति का अनुभव करते अतीन्द्रिय सुख में झूमना, इसको कहा जाता है हर्षित | इसके लिए साक्षीपन की सीट पर सेट रह माया और प्रकृति के पपेटशो को मनोरंजन के रूप से देखो।

 

9) जो सहनशील है वही ड्रामा की ढाल पर ठहर सकता है और हर्षित रह सकता है। सहनशीलता नहीं तो ड्रामा की ढाल को पकड़ना भी मुश्किल है। इस समय जो भी कर्म करते हो उसमें करन-करावनहार की स्मृति सदा रहे। कराने वाला बाप है, करने वाला निमित्त है, अगर यह स्मृति में रख कर्म करो तो अनुभव होगा कि साक्षी हो जैसे पार्ट बजा रहे हैं।

 

10) आपके हर संकल्प, हर बोल में विशेषता हो । सदा सरल स्वभाव, सरल बोल, सरलता सम्पन्न कर्म हों, ऐसे सरल स्वरूप रहो। सदा एक की मत पर, एक से सर्व सम्बन्ध, एक से सर्व प्राप्ति, ऐसे एक द्वारा सदा एकरस रहने के सहज अभ्यासी रहो। सदा खुश रहो, खुशी का खजाना बांटो। खुशी की लहर सर्व में फैलाओ, यही सच्ची सेवा है। ,

 

11) सरलचित नेचर होगी तो हर्षित रहने के साथ नयनों से, मुख से और चलन से मधुरता प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देगी। कभी मुख से कटुवचन नहीं निकलेंगे। उनका दिल, दिमाग, बोल सब एक समान होगा। दिल में एक, बोल में दूसरा - यह सरलता की निशानी नहीं है। सरल स्वभाव वाले सदा निर्माणचित, निरहंकारी, निर-स्वार्थी होते हैं। सरल

 

12) होलीहंस की विशेषता - सरल - चित, सरल वाणी, वृत्ति, सरल दृष्टि । बापदादा को सबसे प्रिय, सबसे समीप साफ दिल वाले प्यारे हैं। साफ दिल सदा बापदादा के दिलतख्त नशीन, सर्व श्रेष्ठ संकल्प पूर्ण होने के कारण वृत्ति में, दृष्टि में, बोल में, सम्बन्ध-सम्पर्क में सरल और स्पष्ट एक समान दिखाई देते हैं।

 

13) बापदादा सभी बच्चों के चलन और चेहरे में, बोल व कर्म में सरलता और मधुरता देखने चाहते हैं। अगर आवेशता या थकावट के कारण थोड़ा भी बोल मधुर नहीं है, चेहरा मधुर नहीं है, सीरियस है तो गुण सम्पन्न नहीं कहेंगे। कैसे भी सरकमस्टॉन्स हो लेकिन मेरा जो गुण है, वह मेरा गुण इमर्ज होना चाहिए। जैसे बापदादा वैसे हूबहू वही गुण, वही कर्तव्य, वही बोल, वही संकल्प अनुभव हो, सभी के मुख से निकले यह तो वही लगते हैं।

 

14) अभी-अभी आवाज में, अभी-अभी आवाज़ से परे, जितना यह अभ्यास सरल और सहज हो जायेगा उतना सम्पूर्णता समीप दिखाई देगी। सम्पूर्ण स्टेज की निशानी है - उनका पुरुषार्थ सरल होगा। याद की यात्रा, सर्विस दोनों ही सहज पुरुषार्थ में आ जाते हैं। जब दोनों में सरल, सहज अनुभव हो तब समझो सम्पूर्णता की अवस्था प्राप्त होने वाली है।

 

15) मन, वाणी, कर्म में सरलता और सहनशीलता यह दोनों आवश्यक हैं। अगर सरलता है, सहनशीलता नहीं तो भी श्रेष्ठ नहीं। सरलता के साथ सहनशीलता है तो शक्ति स्वरूप कहा जाता है। शक्तियों के चित्रों में सरलता और सहनशीलता दोनों गुण दिखाते हैं। अभी की रिजल्ट में कहाँ सहनशीलता अधिक है, कहाँ सरलता अधिक है। अब इन दोनों को समान बनाओ।

 

16) जितना जो स्वयं सरल होंगे उतना याद भी सरल रहेगी। जितना जो हर बात में स्पष्ट अर्थात् साफ होगा उतना सरल होगा । जो जैसा स्वयं होता है वैसे ही उनकी रचना में भी वही संस्कार होते हैं। तो हर गुण के प्रैक्टिकल स्वरूप एक्जैम्पल बनो ।

 

17) बापदादा को सबसे प्यारे साफ दिल वाले बच्चे हैं । साफ दिल सदा बापदादा के दिल तख्तनशीन हैं। वे वृत्ति में, दृष्टि में, बोल में, सम्बन्ध-सम्पर्क में सरल और स्पष्ट एक समान दिखाई देते हैं । सरलता की निशानी है - दिल, दिमाग, बोल एक समान। दिल में एक, बोल में दूसरा - यह सरलता की निशानी नहीं है। सरल स्वभाव वाले सदा निर्माणचित, निरहंकारी, निर- स्वार्थी होते हैं। वे सरल-चित, सरल वाणी, सरल वृत्ति, सरल दृष्टि वाले होते हैं।

 

18) जैसे कोई की विशेष नेचर होती है, उस नेचर के वश न चाहते भी चलते रहते हैं। कहते हैं चाहती नहीं हूँ लेकिन मेरी यह नेचर है। ऐसे आप बच्चों की सरल नेचर हो जो सबको अनुभव हो कि यह सहज योगी, स्वत: योगी हैं। क्या करूँ, कैसे योग लगाऊं .. यह बातें खत्म। हैं ही सदा सहयोगी अर्थात् योगी । इसी एक बात को नेचर और नैचुरल करने से सभी सबजेक्ट में परफेक्ट हो जायेंगे।

 

19) सर्वस्व त्यागी बच्चों में मुख्य सरलता और सहनशीलता का गुण अवश्य होगा। ऐसे बच्चे स्वयं हर्षित रहते और सर्व को आकर्षित करते हैं। वे एक दो के स्नेही बन जाते हैं। अगर सरलता नहीं तो स्नेह भी नहीं हो सकता । जैसे साकार रूप में देखा जितना ही नॉलेजफुल उतना ही सरल स्वभाव । बुजुर्ग का बुजुर्ग, बचपन का बचपन ।

 

20) सरलता लाने के लिए सिर्फ एक बात ध्यान पर जरूर रखनी है। अपनी स्थिति स्तुति के आधार पर न हो। कई बच्चे कर्त्तव्य के फल की इच्छा ज्यादा रखते हैं इसलिए जब स्तुति नहीं होती तो स्थिति हलचल में आ जाती हैं। निंदा होती है तो निधनके बन जाते हैं। अपनी स्टेज को छोड़ धनी को भी भूल जाते हैं इसलिए स्तुति के आधार पर स्थिति नहीं रखना।

 

21) जो सरल स्वभाव वाले होंगे उसमें समेटने की शक्ति स्वतः होगी। सरल स्वभाव वाला सभी का सहयोगी और स्नेही भी होगा और जितना सरल स्वभाव वाला होगा उतना माया कम सामना करेगी। सरल स्वभाव वाले का व्यर्थ संकल्प नहीं चलता। उसका समय भी व्यर्थ नहीं जाता। उनकी बुद्धि विशाल और दूरांदेशी रहती है, इसलिए उनके आगे कोई भी समस्या सामना नहीं कर सकती।

 

22) स्वच्छता भी सरलता की निशानी है। जितनी सरलता उतना स्वच्छता होगी इसलिए सभी को अपनी तरफ आकर्षित करेंगे। सच्चाई और सफाई भी तब होगी जब अपने स्वभाव को सरल बनायेंगे। सरल स्वभाव वाला बहुरूपी भी बन सकता है। ऐसे सरल स्वभावी सदा हर्षित रहते और सर्व को आकर्षित करते हैं।

 

23) जो जैसे कर्म करता है वैसा उनका नाम भी पड़ता है। कर्म यदि श्रेष्ठ हैं तो नाम पड़ेगा श्रेष्ठमणी । श्रेष्ठमणी बनने के लिए मन, वाणी, कर्म में सरलता और सहनशीलता यह दोनों गुण आवश्यक हैं। अगर सरलता है सहनशीलता नहीं तो भी श्रेष्ठ नहीं इसलिए सरलता और सहनशीलता दोनों साथ-साथ चाहिए।

 

24) अव्यक्त स्थिति रूपी दर्पण को साफ और स्पष्ट करने के लिए सरलता, श्रेष्ठता और सहनशीलता इन तीन बातों पर ध्यान दो। अगर तीनों में से एक भी बात की कमी है तो दर्पण पर भी कमी का दाग दिखाई पड़ेगा इसलिए जो भी कार्य करते हो, उसमें साधारणता दिखाई न दे। साधारणपन को श्रेष्ठता में बदली करो, हर कार्य में सहनशीलता और वाणी में सरलता को धारण करो तब सर्विस में सफलता दिखाई देगी।

 

25) जो सहनशील बच्चे हैं वे अपनी सहनशीलता की शक्ति से कैसे भी कठोर संस्कार वाले को, कैसे भी कठिन कार्य को शीतल बना देते हैं वा सहज कर देते हैं । सहनशीलता के गुण वाला गम्भीर होगा और गहराई में जायेगा। वह कभी घबरायेगा नहीं। गहराई में जाकर सफलता प्राप्त करेगा ।

 

26) सहनशीलता वाले बाहरमुखता के वायब्रेशन को ही नहीं, लेकिन मन के संकल्प भी जो उत्पन्न होते हैं, उन संकल्पों की उत्पत्ति को देखकर भी घबरायेंगे नहीं। अपनी सहनशीलता से सामना करेंगे और सूरत से सदैव सन्तुष्ट वा प्रसन्नचित्त दिखाई देंगे। उनके नैन चैन कभी भी असन्तुष्टता के नहीं दिखाई देंगे। वे सन्तुष्टमणि होने के कारण सदा हर्षित रहते हैं।

 

27) इस सहजयोगी जीवन में अगर मुश्किलातों का अनुभव होता है तो सहज राज्य कैसे करेंगे । यहाँ के संस्कार ही वहाँ ले जायेंगे। देखो, आपके यादगार जो देवताओं के चित्र बनाते हैं उनकी सूरत में सरलता ज़रूर दिखाते हैं, तो जो जितना सहज पुरुषार्थी होगा वह मन्सा में भी सरल, वाचा में भी सरल, कर्म में भी सरल होगा। उसको ही फरिश्ता कहते हैं ।

 

28) आप सभी मास्टर विश्व-निर्माता हो। इस स्मृति से निर्माता का गुण सहज आ जायेगा और जहाँ निर्माणता अर्थात् सरलता नेचुरल रूप में रहेगी वहाँ अन्य गुण भी आटोमेटिकली आ ही जाते हैं। तो सदैव इस स्मृति स्वरूप में स्थित रहकर फिर हर संकल्प वा कर्म करो। फिर यह जो भी छोटी-छोटी बातें सामना करने के लिए आती हैं, वह ऐसे अनुभव होंगी जैसे कोई बुजुर्ग के आगे छोटे-छोटे बच्चे बचपन के खेल करते हैं। उसका उन्हें कोई असर नहीं होता।

 

29) बाप को भोलानाथ कहते हैं लेकिन ऐसा भोला नहीं है जो सामना न कर सके। भोलानाथ के साथ-साथ आलमाइटी अथॉरिटी भी है। आप भी अपने शक्ति स्वरूप को भूल सिर्फ भोले नहीं बनना, नहीं तो माया का गोला लग जायेगा। ऐसा शक्ति स्वरूप बनो जो माया सामना करने के पहले ही नमस्कार कर ले। बहुत सावधान, खबरदार-होशियार रहना ।

 

30) बापदादा का वरदान है सदा खुश रहो, खुशी का खजाना बांटो, खुशी की लहर सर्व में फैलाओ। आपके चेहरे पर सदा खुशी की मुस्कराहट चमकती रहे। ऐसे हर्षित मुख रहो। इसके लिए बोल में मधुरता, सन्तुष्टता, सरलता की नवीनता अवश्य हो। ब्राह्मण आत्माओं के बोल साधारण बोल न हों। हर कर्म में ऐसी नवीनता हो जो हर एक उससे प्राप्ति का अनुभव करे। ओम् शान्ति

 


20-05-2026 मधुबन “मातेश्वरी जी के पुण्य स्मृति दिवस पर क्लास में सुनाने के लिए जगदम्बा माँ की विशेषतायें तथा आलमाइटी के साथ मम्मा की रूहरिहान


1) मम्मा का लौकिक नाम राधे था परन्तु जैसा नाम था वैसे राधे मुरली की मस्तानी थी, बाबा का एक एक शब्द बड़े प्यार से सुनती, समाती और उसे बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट कर सबको सुनाती इसलिए तो सरस्वती के हाथ में ज्ञान की सितार दिखाते हैं।

 

2) मम्मा को ड्रामा का पाठ बहुत पक्का था । उसको साक्षी हो करके देखने की इतनी अच्छी आदत मम्मा की थी, जो कोई भी दृश्य को देखते कभी हलचल में नहीं आई। सदा एकरस मुस्कराता हुआ चेहरा रहता। हम सबको भी सदा नथिंगन्यु का पाठ पढ़ाकर अचल-अडोल बना देती ।

 

3) मम्मा के चेहरे पर कभी फिकर के चिन्ह नहीं देखे, कोई शरीर भी छोड़ दे या अपने ही शरीर में कुछ हुआ तो भी ज्यादा सोच नहीं, मम्मा साधारणता से नहीं रहती थी। मम्मा को सदा बहुत ऊंचे रूहानियत के नशे में देखा।

 

4) मम्मा को बाबा ने कहा तुम लक्ष्मी बनेगी, बस, एक बारी कहने से मम्मा की सूरत और सीरत बदल गई । गुणवान बनना है, गुण देखना है, गुण दान करना है - यह तीन बातों में मम्मा पक्की थी इसलिए उनकी उम्र भल कम थी लेकिन धारणा में बड़ी होने कारण उनको सब बड़े-छोटे दिल से मम्मा कहने लगे, गुणमूर्त मम्मा सबसे नम्बरवन चली गई।

 

5) क्लास में हाज़िर रहना ये भी बाबा का फरमानबरदार बच्चा बनना है लेकिन न केवल रेग्युलर बल्कि पंक्चुअल होना है। ज़रा भी ऊपर नीचे न हो - ये हमें मम्मा ने सिखाया। मुरली और सवेरे का योग कभी मिस न हो, जिसको बाबा ने कहा गफलत न करो, जिसे ओना होता है वो कभी गफलत नहीं करता है ।

 

6) मम्मा ने मर्यादाओं में एक्यूरेट रहना सिखाया। मम्मा ऐसी देही-अभिमानी स्थिति में रहती थी जो मम्मा से बाबा के गुण और कर्म दिखाई देते थे। मम्मा में तीन विशेषतायें स्पष्ट दिखाई देती थी एक - रूहानियत, दूसरा स्वमान और तीसरा बाप से सर्व सम्बन्ध का स्नेह। तो हमें भी इन्हीं तीन गुणों को स्वयं में धारण करना है, इससे देह-अभिमान सहज खत्म हो जायेगा।

 

7) मम्मा के सिर पर अमृत का कलश शिवबाबा ने रखा, मम्मा उसे धारण कर सुनाने के निमित्त बनी। लेकिन मम्मा हमेशा कहती थी पिता-प्रसादे । बाप से मिला हुआ सुना रही हूँ । स्वयं की धारणा में जो है वह सुना रही हूँ, तभी वाणी में वह मधुरता, सच्चाई झलकती थी । जितनी हमारे में सत्यता, पवित्रता होगी उतनी मिठास आयेगी। जरा भी अपवित्रता है, मन में किसी के लिए ग्लानि है तो वाणी कडवी हो जायेगी।

 

8) मीठी माँ ने हम सब बच्चों को बड़े प्रेम से, इशारों से पालना दी। मम्मा का चित्त बिल्कुल साफ था। मम्मा हरेक बच्चे की बात दिल में ऐसे समा लेती थी जैसे कोई बात ही नहीं हुई । शिक्षायें देते हुए भी अन्दर समा लेना, समाने की शक्ति और प्यार से उसको चेंज कर देना, यह बहुत बड़ी विशेषता मम्मा में देखी। मम्मा ने कभी दूसरों के अवगुण अन्दर चित्त पर नहीं रखे। ,

 

9) मम्मा सदा अपने स्वमान में रहती थी, उन्हें बीजरूप स्थिति बनाने का, सब संकल्प समेट लेने का, विस्तार में न जाने का नैचुरल आर्ट था। समेटना, समा लेना। कभी कोई बात में विस्तार में आया हुआ नहीं देखा, जिस कारण मम्मा की मुरली बहुत प्रभावशाली होती थी। वह मम्मा की दिव्यता, सत्यता की आकर्षण चेहरे पर भी थी ।

 

10 ) मीठी ज्ञान चन्द्रमा मां की शीतलता को देख करके क्रोध करने वाली आत्मायें भी अपने आपमें शीतलता महसूस करने लग पड़ती थी। उनके चेहरे पर कभी थकावट की फीलिंग महसूस नहीं होती थी। वे सदा अथक होकर ईश्वरीय सेवा में हाँ जी करके बाबा के दिलतख्त पर बैठ गई।

 

11) इतनी आत्माओं के संग में आते हुए भी सभी की बातों को सुनते हुए भी खुद हर बात से न्यारी और प्यारी रही। कभी मम्मा की दृष्टि में किसी आत्मा के प्रति भी चेंज नहीं आई। वही मीठी दृष्टि हर किसी के प्रति रही । साथ-साथ उसकी कमियों पर सावधानी भी जरूर देती थी।

 

12 ) भल कैसे भी अवगुण वाली आत्मा हो लेकिन मम्मा के मुख पर कभी किसी भी आत्मा प्रति कोई अशुभ बोल नहीं निकलते थे, जिसका कोई फायदा ले लेवे। सदा शीतल स्वभाव और मीठे बोल उच्चारण करने वाली माँ का सदा यही लक्ष्य रहा कि सबके दुःख दूर करूँ। मम्मा को कभी किसी बात के कारण आवेश नहीं आया। उनके मुख से कभी तेज आवाज नहीं सुना । मम्मा शान्ति की अवतार, प्रेम की मूर्त थी ।

 

13) गम्भीरता का गुण जो सर्वगुणों की खान है, उसका प्रत्यक्ष स्वरूप मम्मा में देखा। ममता वाली माँ नहीं, अच्छी माँ, टीचर, गुरु जैसी माँ। खुद के सबूत से सिखाने वाली माँ । गम्भीरता और धैर्यता के कारण मम्मा में समाने और समेटने की शक्ति थी। समाने और समेटने के कारण मम्मा सहनशीलता की मूर्त थी । सहनशीलता के गुण से सदा शीतल और शान्त थी।

 

14) बाबा जो भी सुनाता, मम्मा उसे इतने ध्यान से सुनती जैसे उसी समय एक-एक बात का स्वरूप बनती जा रही है इसलिए मम्मा सदा अचल अडोल, एकरस स्थिति में रही । मम्मा की स्थिति कभी नीचे ऊपर नहीं देखी । पुरुषार्थ भी कोई मेहनत वाला हार्ड नहीं किया। मम्मा के चेहरे से सदा प्युरिटी की रॉयल्टी झलकती थी। इस प्युरिटी की पर्सनैलिटी के कारण ही जगदम्बा के रूप में मम्मा का इतना गायन और पूजन आज तक है।

 

15) अटल निश्चय किसको कहा जाता है, वह मम्मा की सूरत से देखा। कभी भी मम्मा ने श्रीमत में अपनी मत मिक्स नहीं की होगी। मेरा विचार यह है, मैं यह समझती हूँ... यह मम्मा ने कभी नहीं कहा। परन्तु बाबा ने यह कहा है, बाबा ने यह समझाया है। वह भी बताने में ऐसा रस जो हर एक को सहज समझ में आ जाए कि बाबा ने किस रहस्य से कहा है।

 

16) मम्मा की चलन कभी साधारण नहीं देखी, सदा रॉयल इसलिए मम्मा शिवबाबा की पोत्री, ब्रह्मा बाबा की बेटी बनने से सर्व की मनोकामना पूर्ण करने वाली कामधेनु माँ बन गई। मम्मा ने अपने लिए कोई कामना नहीं रखी। बाप के दिये हुए खजाने से सदा सम्पन्न रही।

 

17) मम्मा ने कभी अपना शो नहीं किया । गुप्त पालना दी। अच्छी धारणा कराने में मदद की । आज दिन तक भी देश विदेश में बाबा के कई बच्चे हैं जिनका अनुभव है कि हम जैसे साकार मात-पिता की पालना में पल रहे हैं।

 

18) मम्मा ने हम बच्चों की पालना करने में इतना सर्वोत्तम श्रेष्ठ पार्ट बजाया, इस कारण गॉडेज ऑफ नॉलेज कहलाई, यह टाइटिल मम्मा के सिवाए किसी को नहीं मिल सकता। शिवबाबा की नॉलेज को इतना धारण किया है तब विद्या की देवी बनी है, इसलिए विद्या धारण करने के लिए सरस्वती को याद करते हैं।

 

19) मम्मा को स्वमान, स्वधर्म में रहने का सदा नशा रहा। स्वधर्म हमारा शान्त है, उसमें मम्मा शक्ति अवतार रही। बाबा ने जो कहा मम्मा की बुद्धि ने माना। मम्मा ने कभी नहीं कहा होगा - मैंने यह किया, सदा बाबा के तरफ इशारा किया। मैं बेटी हूँ, मात-पिता वह है, मम्मा इतनी निरहंकारी थी।

 

20) मम्मा है ब्रह्मा की बेटी | संबंध में इतनी स्वच्छता, पवित्रता की शक्ति थी जो जगदम्बा बन गई । और साथ-साथ मम्मा को भविष्य का, हम सो का ऐसा नशा था जो नैन चैन से, चेहरे से वह नशा दिखाई देता था जैसे सचमुच श्रीलक्ष्मी है। जैसे वह संस्कारों में भर गया - किसकी हूँ और भविष्य मेरा क्या है।

 

21) मम्मा सदा एकान्त में रहती थी, रोज़ 2 बजे सवेरे उठकर बाबा की यादों में एकान्त में चली जाती, इसी पुरुषार्थ से मम्मा का सम्पूर्ण स्वरूप कई बार दिखाई पड़ता था ।

 

22) मम्मा नम्बरवन आज्ञाकारी रही, मम्मा ने बाबा के हर इशारे को समझा और हम बच्चों को बहुत सरल करके स्पष्ट करके सुनाया। मम्मा के महावाक्यों में एक-एक बात का स्पष्टीकरण है। बाबा के साथ लगन कैसी हो, वह भी मम्मा की देखा। सूरत से

 

23) मम्मा हमेशा कहती थी कि शक्ति जमा करने में आप लोग कितनी मेहनत करते हो और फालतू खर्च कितनी जल्दी कर लेते हो। फालतू बातों में शक्ति खर्च करके फिर उदास, कमजोर हो जाते हो। कमाई करने में इतना टाइम नहीं देते लेकिन सारा दिन खर्चा ही खर्चा, फिर देवाला हो जाता और जब कोई बात सामने आती है तो कहते बहुत मुश्किल है क्योंकि ताकत नहीं है ।

 

24) मम्मा के दो स्लोगन बहुत याद रहते हैं -

1- मम्मा सदा कहती थी -‘“हर घड़ी हमारी अन्तिम घड़ी है"।

2- हुक्मी हुक्म चला रहा है। यह दो मन्त्र मम्मा हमेशा याद रखती और सबको याद दिलाती।

इसी मन्त्र से हम सहज नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप हो जायेंगे, किन्हीं झंझटों में नहीं जायेंगे । और अपनी बुद्धि को सब बातों से फ्री रख बाबा की आशाओं को पूर्ण कर सकेंगे।

 


“मम्मा के साथ आलमाइटी पिता की गुह्य रहस्य - युक्त रूहरिहान "


हे श्री राधे बेटी जागो, रात्रि का सुख उठा लो । योगियों की तो रात होती है ना! इस नेष्ठा के समय शान्ति में बैठकर अपने शुद्ध स्वरूप को धारण कर, अपने ईश्वरीय कायदे को मानकर उसी प्रमाण चलते चलो। देखो बेटी, अमृतवेले का यह शुभ मुहूर्त है । एक दिन पूरा हो दूसरा दिन आरम्भ हो रहा है। तो इस समय यह जागृत अवस्था भी अनायास होनी चाहिए।

 

मेरी प्यारी राधे बेटी, तेरी चाल दुनिया से न्यारी है, जब सारी दुनिया सोती है तब तू जागकर शान्ति में बैठ, योग की गहरी अवस्था में बैठ इस आसुरी दुनिया को जैसे विनाश के लिए नेष्ठा रूपी पंखा लगाती हो, जब विनाश की यह ज्वाला भड़केगी तब तो आसुरी सृष्टि का विनाश और दैवी सृष्टि की स्थापना होगी, इसलिए योग के नेष्ठा की यह प्वाइंट बहुत जरूरी है। जब हर एक बच्चा उसी शान्त अवस्था में योगयुक्त होकर रहेगा तब मेरे सम्पूर्ण अव्यक्त चरित्रों को और पास्ट फ्युचर के राज़ों को अच्छी तरह से समझ सकेगा। सभा में भी इस नेष्ठा में सभी नम्बरवार बैठते हैं। अव्यक्त प्रभु कभी - कभी व्यक्त में आकर वत्सों को देखकर हर्षित होते हैं और अपने सूक्ष्मवतन के शोभनिक फूलों की उन पर वर्षा करते हैं। ऐसे सम्पूर्ण सच्चे पुरुषार्थी बच्चे ही मेरे प्राण हैं। स्थूल और सूक्ष्म में उन्हें मेरी मदद मिलती है।

 

हे यज्ञ माता सामने बैठे बच्चों को लाइट का ताज पहनाने के लिए तुम निमित्त बनी हो। ऐसे सुहावने ब्रह्म महूर्त के समय सुप्रीम लाइट के ताज पहनाने की सेरीमनी का दृश्य कितना सुन्दर और रमणीक, मीठा व प्यारा होगा। हे बेटी राधे ईश्वर के गले में पिरोये हुए रत्नों को जानती हो ना! उन्हीं 108 रत्नों को ज्ञान की पॉलिश अर्थात् शुद्ध सम्पूर्ण बनाए ईश्वर के गले में पिरोने के लिए तुम निमित्त बनी हो। तुम ईश्वर को सम्पूर्ण माला पहनाती हो, तो ईश्व भी पुत्री को भविष्य में सम्पूर्ण वैभवों से सजाता है। मेरे 108 रत्न सम्पूर्णता को अवश्य प्राप्त करेंगे, इसलिए विजय माला का गायन है ना।

 

में यह मेरा सुनाना और गुम हो जाना, यह राज़ भी ड्रामा नूंधा हुआ है। अभी संगम पर महारथी, घोड़े सवार और प्यादे प्रत्यक्ष हो अपना चमत्कार दिखायेंगे । बहादुर बच्चे इन कठिन आपदाओं से बच सकेंगे और वही प्यारे वत्स इन परीक्षाओं में पास हो इनएडवांस ही अपने सूक्ष्मवतन में आकर निवास करेंगे। कठिनता के पहाड़ों को अर्थात् मुश्किलातों के पहाड़ों को अंगुली पर उठाने वाले वत्सों को ही प्रभु सुनाता है कि कोई भी तूफान आये तो विदेही बनकर रहना । देह में अथवा प्राकृतिक तत्वों में आयेंगे तो आपको ममता आयेगी और अवस्था डगमग हो जायेगी। तो यह विदेही बनने का अभ्यास जल्दी ही अपने में धारण कर लो, इसमें ही सब बच्चों का कल्याण है।

 

पिता को ही बच्चों को सब शिक्षा देनी पड़ती है क्योंकि तुम सौभाग्यशाली प्यारे बच्चे हो और सब तो मध्यम और कनिष्ठ भाग्यशाली हैं। अभी हर एक को शान्ति में रह अपने दिव्य अलौकिक कर्तव्य में तत्पर रहना है अथवा जागृत रहना है। जागृतता भी कौन सी? ज्ञान की। कई तो जागते हुए भी सोते रहते हैं। जिसका ज्ञान का तीसरा नेत्र खुला है, वही सदैव जागती ज्योत हैं। अभी समय बिल्कुल थोड़ा है, तो अच्छी तरह से पुरुषार्थ कर आगे बढ़ना है। नहीं तो पीछे पुरुषार्थ का समय नहीं मिलेगा। प्रिय वत्सों के साकार स्वरूपों का साक्षात्कार करने पर अव्यक्त प्रभू को दिल में आता है कि कैसे पुरुषार्थी वत्स अपनी म मस्ती में रमण कर रहे हैं, जबकि मैं जानता हूँ और मेरे पास पहले से प्लान भी है फिर भी मैं व्यक्त में प्रवेश कर देखता हूँ कि मेरे सर्व त्यागी बच्चे कैसे योग में बैठे हैं। तुम प्राणों में इतनी ताकत है जो मुझ प्रभु को भी ऊपर से नीचे उतार सकते हो, परन्तु जिस सर्वोत्तम ताकत को तुम जानते हो और खींच सकते हो, उस ताकत के राज़ों को समझना कोई कोई वत्सों के लिए मुश्किल भी है। कोई कोई वत्स समझते हैं इतनी बड़ी ताकत नीचे आवे तो धरती भी कांप उठे, पर धरती को जरा भी धक्का नहीं लगता, यह भी तो उसकी पावर है। यह भी उसकी ही ताकत है जो इतनी बड़ी शक्ति नीचे आये और धरती थोड़ी भी नहीं हिले। अगर वो अपनी सम्पूर्ण ताकत को इमर्ज करके आये तो उसके सामने कोई ठहर न सके। अगर ऐसा हो तो फिर सर्विस कैसे हो सकती है इसलिए वह अपनी ताकत को मर्ज करके आते हैं। इस मेरे राज़ को ज्ञानी तू आत्मा अनन्य वत्स ही जानकर बुद्धियोग से मेरे को प्रत्यक्ष करते हैं। कभी भी संशय में आकर डगमग नहीं होना, एक बल एक भरोसे में स्थित रहना है। नहीं तो ईश्वर क्या नहीं कर सकता है। भक्तों को खुश करने के लिए तो कहाँ-कहाँ अपना प्रभाव दिखाना भी पड़ता है, पर यहाँ तो मेरे वत्स ही हैं, तो हर एक को सूक्ष्म शुद्ध स्वरूप बनाकर उसमें स्थिर करना है। यह भी तो एक शक्ति है।

 

सुप्रीम पीस (शान्ति) में चलने वाली राधे बेटी, समय बहुत नजदीक आ रहा है। बहुत भारी परीक्षा तुम बच्चों के सामने आने वाली है। परीक्षाओं को तुम दैवी वत्सों को योगबल में रहकर पार करना है । ऐसे ज्ञानी और योगी तू आत्मा बच्चों का प्रभु रक्षण करते हैं और अपनी सूक्ष्म मदद देते हैं।

 

हे बेटी राधे, कभी प्रभु बोलता है कि परीक्षाओं को पार करना है और कभी कहता है कि परीक्षाओं से बचाने के मैं निमित्त हूँ। परीक्षाओं को पास करने का राज़ पहले से ही मैं बता देता हूँ, तो परीक्षाओं को पास करने का मार्ग सहज हो जाता है। बाकी ऐसे नहीं कि परीक्षा आयेगी ही नहीं । परीक्षाओं का रिहर्सल होना तो जरूरी ही है। अन्त में परीक्षाओं का रूप सहज देखने में आयेगा, लेकिन इसमें वही पास होगा जो अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होगा। हर एक अपने पुरुषार्थ से ही प्रालब्ध बनाता है। प ईश्वर तो यही चाहता है कि जैसे मैं अव्यक्त वतनवासी हूँ वैसे मेरे वत्स भी अब अव्यक्त वतनवासी बनें। बाकी मैं क्या नहीं कर सकता हूँ! मैं चाहूं तो अभी वैकुण्ठ को प्रगट कर सकता हूँ। परन्तु यह कर्मक्षेत्र है, सुख और दुःख 'के हिसाब-किताब को भोगने का, जो कर्तव्यों के आधार पर ही होता है। कर्म किये बिना कोई भी कर्मक्षेत्र पर रह नहीं सकता । साकार स्वरूप कर्म करने के लिए अवश्य ही बंधायमान रहता है। राइट और रांग, शुद्ध और 'अशुद्ध कर्म करने से शुद्ध अथवा अशुद्ध प्रालब्ध बनती है।

 

तुम प्राणों ने जितनी मेहनत की है उतनी ही प्रालब्ध बनाई है। पुरुषार्थ पूरा हो जाता है तो प्रालब्ध भी पूरी बन जाती है, जिससे सतयुग-त्रेता में जन्म-जन्मान्तर के लिए अविनाशी सम्पूर्ण सुख की प्राप्ति होती है। इस समय हर एक वत्स को अपनी हर एक इन्द्रिय को शान्त स्वरूप, शीतल बनाना है। यह मुख, कान, हाथ, नैन सब इशारे से चलने चाहिए। अपने शान्त स्वरूप में स्थित हो जाएं तो जो संकल्प करेंगे वह एक्ट में आयेगा, यही अति सूक्ष्म ताकत है, यही निःसंकल्प अवस्था है। इसको ही इन्द्रियों की शान्त स्वरूप अवस्था कहते हैं। इस तरह चलने से कभी भी कर्मेन्द्रियों से विकारी कर्म नहीं होगा ।

 

तुम्हारे इस दैवी कुटुम्ब का आपस में बड़ा प्यार होना चाहिए। हर एक एक्टर अपनी चमक दिखाये, हर एक को ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा की याद दिलानी है। इस दैवी लव से ही देवी-देवताओं के धरती की स्थापना होती है। अभी तुम अनन्य वत्सों को ही इस कलियुगी पहाड़ को तोड़ नया सतयुगी दिव्य स्थान बनाना है, जिस सतयुग के सुहावने समय पर शेर और बकरी में भी दैवी प्यार रहता है। प्रकृति और परमात्मा का भी यह अनादि मिलाप है। मिलाप एक एक्ट शब्द से प्रसिद्ध नहीं होता परन्तु दूसरों को अपनी-अपनी रस्सी में खींचने से ही प्रसिद्ध होता है। हे प्यारे वत्सों ये प्वाइंट बड़ी सूक्ष्म है। अच्छा।

 


दादी प्रकाशमणि जी के अमृत वचन " ज्ञानी तू आत्मा का पहला पहला गुण है - सहनशीलता


 

" बाबा हम बच्चों को यह बहुत बड़ा लेसन देते कि हे बच्चे इस ज्ञान की मंजिल पर चलेंगे तो सहन करने की शक्ति धारण करनी पड़ेगी। सहनशील बनने की थोड़ी तकलीफ लेनी पड़ेगी । यह सहनशीलता का गुण बहुत बड़ी शक्ति है, यह सर्व गुणों में महान गुण है। यह बाबा का बोल सुन सब प्रैक्टिकल चार्ट देखें कि मेरे में सहनशीलता का गुण है?

 

बाबा ने कहा बच्चे दुःख-सुख, स्तुति - निंदा, मान-अपमान सबमें समान रहने की, एकरस स्थिति में रहने की, सहनशील होने की शक्ति चाहिए। तो यह शक्ति चाहिए या मुझ आत्मा का अथवा इस ज्ञान का पहला पहला गुण ही यह है ? ज्ञानी तू आत्मा का गुण है समान रहना। अगर ज्ञानी तू आत्मा में यह गुण नहीं तो वह प्रिय नहीं। जब हम अपने को ज्ञानी तू आत्मा देखते - माना हमारे अन्दर ड्रामा की सारी नॉलेज है। हर आत्मा के सतोप्रधान सतो, रजो, तमो की स्टेजेस की भी नॉलेज है। जब नॉलेज है तो नॉलेज की शक्ति के आधार पर समान रहने की शक्ति स्वत: ही आ जाती है।

 

जैसे बाल से युवा, युवा से वृद्ध होते तो कभी यह नहीं कहते कि ओ नेचर तूने बाल से युवा वा युवा से बूढ़ा क्यों बनाया? परन्तु जानते हैं यह प्रकृति का नियम है। चार ऋतुयें होना यह भी प्रकृति का नियम है । जब हम जानते हैं कि यह नियम है । तो हम क्यों कहें ओ प्रकृति तुम हमें ठण्डी में वा गर्मी में दुःख क्यों देती! हम जानते हैं यह नेचर का गुण है। सर्दी के समय सर्दी, गर्मी के समय गर्मी होनी ही है। हमारे पास उससे बचने के साधन हैं तो उसे यूज़ करें। हम जान गये अभी की प्रकृति है ही तमोप्रधान। सतयुग में प्रकृति सतोप्रधान है इसलिए सुखदाई है। अभी तमोप्रधान है इसलिए प्रकृति पर कभी गुस्सा नहीं आता। - कभी भी हम ऐसे नहीं लड़ते ए सर्दी तू मुझे दुःख क्यों देती? किससे लड़ेंगे? जब बुद्धि में आता यह तो प्रकृति का धर्म है तो उससे लड़ने नहीं जाते। फिर जब कहते क्या करें यह पारिवारिक परिस्थितियां आती हैं। वह तो आयेंगी ही । मैं उससे दुःखी क्यों हूँ! जैसे प्रकृति का दुःख सुख सहन करते, वैसे यह परिवार का भी तो हिसाब-किताब है। मै उसमें क्यों लडूं! हमें उसमें अपनी स्थिति अप-डाउन नहीं करनी है।

 

कभी-कभी सोचते मुझे तो सबसे मान मिलना चाहिए। ये मुझे मान नहीं देता इसलिए गुस्सा आता। लेकिन जब प्रकृति दुःख देती तो गुस्सा क्यों नहीं आता। जब मेरा कोई अपमान करता तो मैं रंज होती लेकिन मैं सोचूं कि मैंने उसे कितना मान दिया है। एक है देना, एक है लेना। जब अपमान पर गुस्सा आता माना मैं मान की भूखी, प्यासी हूँ। मान की मांग है। मैं दाता बनूं या लेवता बनूं? मुझे मान देना है या लेना है? मैं वरदाता हूँ या आत्माओं से वर लेने वाली हूँ? मान मांगना अर्थात् आत्माओं से वर मांगना । बाबा कहता मांगने से मरना भला... मैं दाता की बच्ची दाता हूँ तो लेवता क्यों बनते! यह सवाल हरेक अपने से पूछे।

 

कहा जाता तू प्यार करो तो सब करें। कहते मैं तो सबको प्यार देता लेकिन आगे वाला मुझे ठुकराता। इसमें हमेशा समझो यह मेरा हिसाब-किताब है। 63 जन्मों का हिसाब-किताब चुक्तू करना है। जहाँ प्यार होगा वहाँ सब मान देंगे। शुभ भावना रहेगी, शुभ चिन्तन चलेगा फिर उनके लिए मेरा वरदान रहेगा। अगर मैं इस स्थिति पर रहूंगी तो सब मेरी स्तुति करेंगे। अगर मैं ही अपनी स्थिति पर नहीं रहती तो कोई भी मेरी क्या स्तुति करेगा। अच्छा - ओम् शान्ति ।