Patrapushp of Septemer 2026


अपने जीवन में दातापन के संस्कार इमर्ज कर परमात्म सन्देश वाहक बनो"

प्राणप्यारे अव्यक्त मूर्त मात-पिता बापदादा के अति स्नेही, सदा परमात्म सन्देश वाहक बन विश्व में बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहराने वाले, बाप समान दाता, विधाता और वरदाता बन सर्व आत्माओं को शक्तियों का दान देने वाली निमित्त टीचर्स बहिनें तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण कुल भूषण भाई बहिनें, , ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद के साथ भविष्य महाराजकुमार श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव (जन्माष्टमी) की सबको बहुत-बहुत बधाई हो। बाद समाचार - आप सभी ने रक्षाबंधन के पावन पर्व पर चारों ओर सेवाओं की धूम मचाई, अभी फिर भविष्य महाराजकुमार श्रीकृष्ण के आने की खुशखबरी भी सबको सुनायेंगे। भारत में तो जन्माष्टमी का त्योहार सभी खूब धूमधाम से मनाते हैं। हम सबके सामने तो भविष्य नई दुनिया के नज़ारे घूम रहे हैं। अभी यह पुरानी दुनिया विदाई लेगी और अपनी नई स्वर्णिम दुनिया नयनों के सामने है, जहाँ फर्स्ट प्रिन्स श्रीकृष्ण का आगमन होगा। उस समय प्रकृति भी अपने सतोप्रधान स्वरूप में सबकी सेवा पर हाज़िर होगी। सभी पार्टधारी सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण... हर प्रकार के वैभवों से भरपूर होंगे। अब यही खुशखबरी सबको सुनानी है। भारत में तो कई स्थानों पर बहुत सुन्दर श्रीकृष्ण के चरित्रों की झांकियां भी सजाते हैं, यह भी ईश्वरीय सन्देश देने के अनेक अवसर मीठे बाबा ने हम सबको दिये हैं। तो सबसे पहले आप सबको भविष्य महाराजकुमार श्रीकृष्ण के जन्म दिन की बहुत-बहुत बधाई हो। मुबारक हो। वर्तमान समय को देखते हुए बाबा कहते बच्चे, अभी आप सब अपने दाता स्वरूप में स्थित रह देने वाले बनो। सदा स्मृति रहे कि मुझे हर सेकेण्ड, हर संकल्प में उदारचित्त बन देना है । देने के द्वार सदैव खुले रहें। हम सबको लेना है एक बाप से, देना है सबको। जितना हम देने में बिज़ी रहेंगे उतना हर छोटी बड़ी बात को सहज क्रॉस कर लेंगे क्योंकि महादानी बनने से महान शक्ति की प्राप्ति स्वत: होती है। बाबा कहते बच्चे, विश्व महाराजन् बनने के लिए सिर्फ ज्ञान दाता नहीं बनो, स्नेह और शक्ति का भी सहयोग सबको देते रहो। देने के बाद कभी यह संकल्प न आये कि मैंने इतना दिया, मुझे भी इनसे कुछ मान-शान वा महिमा मिलनी चाहिए। दाता के बच्चे अगर यह संकल्प भी करते हैं तो दाता नहीं हुए। यह लेना भी देने वाले के आगे शोभता नहीं है। दाता के बच्चे कभी यह संकल्प भी नहीं कर सकते कि बाबा मुझे कुछ मदद दे, आशीर्वाद दे । वे तो सर्व शक्तियों से सदा सम्पन्न रहते हैं। तो बोलो, हमारे मीठे भाई बहनें ऐसी सम्पन्न स्थिति का अनुभव करते हो ना! यह सम्पन्न स्थिति ही सम्पूर्णता के समीप लायेगी। वर्तमान समय जबकि चारों ओर दुःख अशान्ति का वातावरण बढ़ता जा रहा है, तो ऐसे समय पर विशेष अपने रहमदिल दाता स्वरूप को इमर्ज कर मन्सा द्वारा सबको शक्तियों का दान देना है। बाकी आप सबका स्वास्थ्य ठीक होगा। जुलाई अगस्त मास में सभी ने खूब योग तपस्या की है। अभी सेवाओं की धूम है । शान्तिवन में भी कई विंग्स की कान्फ्रेन्सेज़ हैं। अक्टूबर मास से अव्यक्त मिलन के सुनहरे पलों में बेहद ब्राह्मण परिवार से सम्मुख मिलना होगा ही । अच्छा - सभी को याद... । ईश्वरीय सेवा में, बी के मोहिनी मुख्य प्रशासिका, ब्रह्माकुमारीज़


ये अव्यक्त इशारे अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो

1) वर्तमान समय आप बच्चे अपना रहमदिल और दाता स्वरूप प्रत्यक्ष करो। आपके सब भण्डारे निरन्तर खुले रहने चाहिए। अनादि, आदि दातापन के संस्कार अपने जीवन में सदा इमर्ज रख, परमात्म सन्देश वाहक बन विश्व में बाप की प्रत्यक्षता का सन्देश फैलाओ।

2) दातापन के संस्कार इमर्ज कर मन्सा द्वारा पुण्य का खाता जमा करो, वाणी द्वारा कमजोर आत्माओं को खुशी में, परेशान को शान की स्मृति में और दिलशिकस्त आत्माओं को उमंग-उत्साह में लाओ, सम्बन्ध-सम्पर्क से आत्मा को अपने श्रेष्ठ संग का रंग अनुभव कराओ तो पुण्य का खाता जमा होता जायेगा ।

3) दाता के बच्चे सर्व को देने की भावना से भरपूर बनो । कभी यह संकल्प नहीं करो कि यह हो तो मैं भी यह करूँ। ऐसी परिस्थिति हो, वायुमण्डल हो तब मैं यह करूँ। दातापन के संस्कार वाले को सब तरफ से सहयोग स्वतः प्राप्त होता है इसलिए मास्टर दाता दूसरों से लेने की भावना नहीं रख सकते।

4) जब आप चमकते हुए सितारे - सूर्य, चन्द्रमा समान अपनी सम्पूर्ण स्टेज पर अथवा मास्टर दातापन की स्टेज पर स्थित होंगे तो भटकती हुई आत्मायें, ढूंढने वाली आत्मायें परवानों की तरह स्वत: ही पाने के लिए, मिलने के लिए फास्ट गति से आपके पास आयेंगी और आप सबको सेकण्ड में बाप द्वारा मुक्ति - जीवनमुक्ति का अधिकार दिलाने की तीव्रगति से सेवा करनी पड़ेगी ।

5) आप भाग्य की लकीर खींचने वाले ब्रह्मा के बच्चे ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियाँ हो इसलिए सदा आपके भण्डारे भरपूर रहें। किसको भी खाली हाथ जाने नहीं देना | सदा दाता के बच्चे देते रहो और सर्व की भावनायें, सर्व की आशायें पूर्ण करते रहो । महादानी, वरदानी बनो यही आपका स्वरूप है।

6) सबसे बड़े से बड़ी देन है - दाता के बच्चे बन सर्व को सहयोग देना । बिगड़े हुए कार्य को, बिगड़े हुए संस्कारों को, बिगडे हुए मूड को शुभ भावना से ठीक करने में सदा सर्व के सहयोगी बनना । इसने यह कहा, यह किया, यह देखते, सुनते, समझते हुए भी अपने सहयोग के स्टॉक द्वारा परिवर्तन कर उसे भरपूर करना - यह सबसे बड़ा दान है।

7) जैसे कोई खाली स्थान होता है तो आलराउन्ड सेवाधारी समय प्रमाण जगह भर देते हैं। ऐसे अगर किसी भी द्वारा कोई शक्ति की कमी अनुभव हो तो भी अपने सहयोग से जगह भर दो, जिससे दूसरे की कमी का भी अन्य कोई को अनुभव न हो, इसको कहा जाता है - दाता के बच्चे बन समय प्रमाण उसे सहयोग की देन देना।

8) जैसे गायन है कि भाग्य-विधाता बाप ने बह्मा द्वारा भाग्य बांटा, तो जो ब्रह्मा का काम, वह ब्राह्मणों का काम | दुनिया वाले कपड़ा बाटेंगे, अनाज बाटेंगे, पानी बाटेंगे लेकिन श्रेष्ठ भाग्य तो आप भाग्य विधाता के बच्चे ही बाँट सकते हो। जिसे भाग्य प्राप्त हो जाए उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता है इसलिए भाग्य बांटने में फ्राखदिल बनो ।

9) दुनिया में भी दान को पुण्य समझते हैं, आप दाता के बच्चे सदा दान करने वाली पुण्य आत्मायें हो। आप किसी भी आत्मा द्वारा अल्पकाल की प्राप्ति लेने की कामना नहीं कर सकते। यह आत्मा कुछ दे तो मैं दूँ, वा यह भी कुछ करे तो मैं भी करूँ, ऐसी हद की कामना नहीं रखना । दाता के बच्चे बन सबके प्रति स्नेह, सहयोग, शक्ति देने वाले पुण्य आत्मा बनो।

10 ) कभी भी अपने पुण्य के बदले प्रशंसा लेने की कामना भी नहीं रखना, यह हद की प्रशंसा को स्वीकार करना सदाकाल की प्राप्ति से वंचित होना है। इसलिए सदा देने में सागर के समान सम्पन्न बनो। आपका हर

बोल औरों को खुशी में, बाप के स्नेह में, अतीन्द्रिय सुख । में रूहानी आनन्दमय जीवन का अनुभव कराये और हर कर्म सर्व आत्माओं के प्रति सदा सहयोग की प्राप्ति कराने वाला हो।

11 ) वर्तमान समय सर्व आत्मायें भिखारी के रूप में भगवान से कुछ न कुछ मांग रही हैं। सभी के मुख में वा मन में यही रहता कि यह दे दो। कोई धन के भिखारी हैं, कोई सहयोग के, कोई सम्बन्ध के, कोई थोड़े समय के लिए सुख-चैन के, कोई आराम वा नींद के, कोई फालोअर्स के भिखारी हैं, आप दाता के बच्चे मास्टर दाता बन अपनी शुभ भावना की वृत्तियों से भिखारी आत्माओं की भूख मिटाओ।

12) जैसे बापदादा सदा बड़ी दिल वाले बेहद की दिल वाले हैं, इसलिए सर्व की दिल लेने वाले दिलाराम हैं, ऐसे बच्चे भी बेहद की दिल फ्राकदिल दातापन की दिल रखने वाले, सदा दिल खुश से जहान को खुश करने वाली खुशनसीब आत्मायें हैं। आप श्रेष्ठ आत्मायें ही जहान के आधार हो। आप सभी जगते, जागती ज्योत बनते तो जहान वाले भी जगते । आप सबकी चढ़ती कला होती है तो सर्व आत्माओं का कल्याण हो जाता है। 13) आप मास्टर दाता प्राप्ति स्वरूप बच्चों को विश्व की आत्माओं प्रति रहम वा उमंग आना चाहिए कि हमारे भाई अल्पकाल की इच्छा में कितने भटक रहे हैं, दाता के बच्चे अपने भाईयों के ऊपर दया और रहम की दृष्टि डालो। महादानी, वरदानी बनो। चमकती हुई सन्तुष्ट मणियां बन सर्व को सन्तोष दो।

14 ) आप पूर्वज, पूज्य आत्माओं को अनेक आत्मायें शान्ति देवा, शक्ति देवा कह याद कर रही हैं। ऐसे समय पर हे शान्ति देवा आत्मायें, मास्टर शान्ति के सागर, मास्टर शान्ति के सूर्य अपनी शान्ति की किरणें, शान्ति की लहरें दाता के बच्चे देवा बन सर्व को देते रहो। ऐसी सेवा करने के विशेष अभ्यासी बनो ।

15) वर्तमान समय सर्व आत्माओं को शान्ति और शक्ति की ही आवश्यकता है। अपनी शक्तिशाली शान्त मन्सा द्वारा आत्माओं को मन की शान्ति का अनुभव कराओ। वाणी और मन्सा दोनों सेवायें साथ-साथ करो। विश्व महाराजन् को विश्व का दाता कहते हैं। तो जब आप अभी सबको सुख शान्ति और शक्ति का दान देंगे तब तो सभी सुखदाता मानेंगे।

16 ) आप दाता के बच्चे सभी को देने वाले मास्टर दाता हो। आप अपनी एक सेकेण्ड की दृष्टि से, अमूल्य बोल से प्यासी आत्माओं की प्यास बुझाओ। कोई भी दर पर आयी हुई भूखी आत्मा खाली हाथ न जाये। जैसे साकार में करके दिखाया, कोई भी आत्मा असन्तुष्ट होकर नहीं गई। तो भल कोई कैसी भी आत्मा हो लेकिन सन्तुष्ट होकर जाये।

17) अपने को सदैव दाता अथवा महादानी समझना है। महाज्ञानी बनने के बाद महादानी का कर्तव्य चलता है। महाज्ञानी की परख महादानी बनने से होती है। अभी आपकी मूर्त में ऐसी झलक होनी चाहिए जो कोई भी अपना वर्सा लेने से वंचित न रहे। ऐसे अपने को दाता के बच्चे दाता समझना है, देने वालों में जो फलक और झलक रहती है, अभी उन संस्कारों को इमर्ज करो।

18) कभी भी किसी भी प्रकार का किसको सहयोग चाहिए तो दाता के बच्चे उन्हें सहयोग दो। लेकिन सर्व के सहयोगी तब बनेंगे जब सर्व के स्नेही बनेंगे। स्नेही नहीं तो सर्व के सहयोगी भी नहीं बन सकते इसलिए मन्सा, वाचा, कर्मणा और सम्बन्ध में भी सहयोगी और सफलतामूर्त बनो ।

19) तड़फती हुई या भिखारी प्यासी आत्माओं की प्यास मिटाने के लिए अपने को अतीन्द्रिय सुख वा सर्व शक्तियों से भरपूर करो। जितना सर्व शक्तियों का खज़ाना, अतीन्द्रिय सुख का ख़ज़ाना इकट्ठा होगा तो अपनी स्थिति कायम रहेगी और अन्य आत्माओं को भी सम्पन्न बना सकेंगे। आप सर्व की झोली भरने वाले दाता के बच्चे हो, सबको देना है। यह देने का दृश्य बहुत जल्दी सामने आयेगा।

20) आप ईश्वरीय सेवाधारी सेवा करने वाले हो न कि सेवा लेने वाले। अगर सेवा लेने वाले बनते हो तो नाम प्रमाण कर्त्तव्य नहीं हुआ। खुदाई खिदमतगार सेवा लेते नहीं, देते हैं क्योंकि दाता के बच्चे हैं। जैसे बाप कुछ लेते नहीं, वह तो सदा देते हैं, ऐसे आप भी देने वाले बनो । अगर कभी प्राब्लम रूप बनते हो तो भी सेवा लेते हो । जो कोई भी प्रकार की एक्स्ट्रा सेवा लेते हैं उन्हें यह नशा कभी नहीं रहेगा कि हम दाता वा वरदाता के बच्चे हैं।

21) दाता के बच्चों को हर सेकेण्ड हर संकल्प में देना है । दाता का मुख्य गुण है उदारचित। वह औरों के उद्धार के निमित्त होगा। तो सदैव समझो कि हम दाता के बच्चे हैं, एक सेकेण्ड भी देने के सिवाए न रहे, उसी को कहा जाता है महादानी। सदैव देने के द्वार खुले हों। जैसे मन्दिर का दरवाजा सदैव खुला रहता है, ऐसे दाता के बच्चे का देने का द्वार कभी बन्द न हो।

22) हर सेकेण्ड, हर संकल्प चेक करो कुछ दिया? लिया तो नहीं? देते जाओ। लेना है बाप से, वह तो ले ही लिया अब देना है। जितना-जितना देने में बिज़ी होंगे तो कोई भी बातें क्रास करना मुश्किल नहीं लगेगा। सब बातें बहुत सहज हो जायेंगी क्योंकि महादानी बनने से महान् शक्ति की प्राप्ति स्वत: होती है।

23) जितना दाता बनते हो उतना भरता जाता है । भण्डारा भरपूर है तो क्यों नहीं दाता बनो, इसको ही कहा जाता है निरन्तर रूहानी सेवाधारी । विश्व महाराजन् बनने के लिए सिर्फ ज्ञान दाता नहीं बनना है। इसके लिए स्नेह और सहयोग भी देना है। अगर यह हाई जम्प दे दिया तो सभी बातों में श्रेष्ठ सहज ही बन जायेंगे ।

24) अगर देने के बाद यह भी संकल्प आता है कि मैंने इतना दिया, मुझे इससे कुछ मान-शान वा महिमा मिलनी चाहिए, तो यह भी लेने की भावना हुई। दाता के बच्चे अगर यह लेने का संकल्प भी करते हैं तो दाता नहीं हुए। यह भी लेना, देने वाले के आगे शोभता नहीं है।

25) दाता के बच्चे सदा सर्व सम्पत्तिवान होते हैं। कभी भक्तपन वा भिखारीपन के संस्कार इमर्ज न हो। ऐसा संकल्प भी न आये कि बाबा मुझे कुछ मदद करे, आशीर्वाद दे। बाबा मुझे सहयोग चाहिए, शक्ति चाहिए। यह चाहिए शब्द दाता, विधाता, वरदाता बच्चों के आगे शोभता नहीं। दाता के बच्चे सर्व शक्तियों से सम्पन्न होते हैं । यही सम्पन्न स्थिति सम्पूर्ण स्थिति को समीप लाती है।

26) तुम बच्चों को किसी भी आत्मा से कुछ लेना नहीं है । सिर्फ एक बाप से ही लेना है और जो लिया है वह सबको देना है । जहाँ देना है, वहाँ लेने की इच्छा नहीं रखना। अगर आत्मा, आत्मा द्वारा कुछ भी लेने की इच्छा रखती है तो उन्हें अल्पज्ञ आत्माओं से अल्पकाल की ही प्राप्ति होगी। एक सर्वज्ञ बाप से सदाकाल की प्राप्ति होगी। किसी प्रकार की लेने की इच्छा अपने स्वमान से गिरा देती है ।

27) कोई भी निर्बल आत्मा आपके सामने आये तो उस निर्बल को बल दो। सर्वशक्तियों का वर्सा जो प्राप्त किया है वह उसे दो। सर्व आत्माओं को बाप का खज़ाना देने वाले दाता बनो, अपनी शक्तियों द्वारा प्यासी व तड़फती हुई आत्माओं को जीयदान दो, वरदाता बन प्राप्त हुए वरदानों द्वारा उन्हें भी बाप के समीप सम्बन्ध में लाओ, यहाँ के दातापन के संस्कारों से भविष्य में 21 जन्मों तक राज्यपद अर्थात् दातापन के संस्कार भर सकेंगे।

28) बापदादा अब बच्चों से यही चाहते हैं कि मेरा हर एक बच्चा मास्टर दाता बनें। तो रहमदिल बन अपने गुणों जितना दूसरों को देते जायेंगे उतना बढ़ता जायेगा। विनाशी का, शक्तियों का सबको सहयोग दो, फ्राकदिल बनो। बढ़ता है - एक दो, हजार पाओ । खजाना देने से कम होता है और अविनाशी खजाना देने से 29) आप बच्चों के पास अनुभूतियों का खजाना सम्पन्न कराते चलो। दाता अर्थात् सेवाधारी। दाता देने के बिना है, तो आप सम्पन्न मूर्तियां मास्टर दाता बन सबको अनुभूति रह नहीं सकते। वे अपने रहमदिल के गुण से किसी को हिम्मत देंगे तो किसी निर्बल आत्मा को बल देंगे। वह मास्टर सुखदाता होंगे।

30) ब्राह्मण आत्माओं के पास ज्ञान तो पहले ही है लेकिन उनके प्रति दो प्रकार से दाता बनो:- 1- जिस आत्मा को, जिस शक्ति की आवश्यकता हो, उस आत्मा को मन्सा द्वारा अर्थात् शुद्ध वृत्ति, वायब्रेशन्स द्वारा शक्तियों का दान अर्थात् सहयोग दो। 2- कर्म द्वारा सदा स्वयं जीवन में गुण मूर्त बन, प्रत्यक्ष सैम्पल बन औरों को सहज गुण धारण करने का सहयोग दो, इसको कहा जाता है गुणदान । दान का अर्थ है सहयोग देना ।


(त्रिमूर्ति दादियों द्वारा मिली हुई अनमोल शिक्षायें)  परचिन्तन-परदर्शन आत्मा को भटकाने वाली गलियां है, इन गलियों को बन्द करने के लिए परोपकारी बनो  (गुल्जार दादी 13-10-94 )

सभी ने याद की यात्रा की, यह याद की यात्रा हम सबके लिए सहज भी है और श्रेष्ठ भी है। सदा हम लोगों के दिल में और है ही क्या! हम तो यही सोचते हैं कि जब से ब्रह्माकुमार या ब्रह्माकुमारी बने तो संसार ही हमारा बाबा है। तो क्या याद आता है? संसार ही याद आता है ना। अगर बुद्धि जायेगी भी तो कहाँ जायेगी ? संसार में ही जायेगी। तो संसार हमारा अभी क्या है? बाबा है ना क्योंकि संसार में दो ही चीज़ें हैं। जो अपने तरफ आकर्षित करती हैं एक व्यक्ति और दूसरा वस्तु। तो व्यक्ति की रीति से सम्बन्ध हैं तो सर्व सम्बन्ध हमारा किसके साथ है? बाबा के साथ है या कोई है, कोई नहीं है? हमारे लिए सर्व सम्बन्ध भी एक बाबा से हैं। तो यही चेक करो कि कोई भी सम्बन्ध रह तो नहीं गया है ? अगर रह गया होगा या थोड़ा बाबा से भी होगा, थोड़ा और भी कहाँ होगा तो बाबा भूल जायेगा क्योंकि बीच में वह व्यक्ति आ गया ना! तो जहाँ व्यक्ति आयेगा वहाँ बाबा तो भूलेगा ना इसलिए एक बाबा दूसरा न कोई। तो सर्व सम्बन्ध भी शिवबाबा के साथ अर्थात् परमात्मा के साथ और वस्तु अर्थात् प्राप्तियाँ । हमको बाबा से क्या प्राप्तियां नहीं हैं? लिस्ट निकालो। प्राप्तियों के आधार से खुशी, सुख, शान्ति सब है और सदाकाल के लिए है, इसीलिए प्राप्तियां चाहिए ना। हमें खुशी कितनी है ? हमारे खुशी की अतीन्द्रिय सुख की, शान्ति की तुलना किससे है ? क्योंकि हम तो सभी शान्ति के सागर में समाये हुए रहते हैं। तो जो सागर में समाये हुए हैं उनको कमी क्या है? जो जिसमें समा जाता है, वह समान बन जाता है। तो प्राप्तियां भी सर्व हैं और सम्बन्ध भी सर्व बाबा से हैं और क्या चाहिए? इसीलिए हम कहते हैं कि हमारा संसार ही बाबा है। तो जब संसार बाबा है तो बुद्धि जायेगी कहाँ। क्या और कुछ है? थोड़ा-थोड़ा कोई उल्टी गलियां तो नहीं रही हुई हैं? यह तो हाई वे है। लेकिन छोटी-छोटी गलियां अगर रही हुई होंगी तो फिर बुद्धि जा सकती है। और वह गलियां विशेष बाबा ने सुनाई चेक करो एक परचिंतन, दूसरा परदर्शन - यह दो गलियां हैं | यह गलियां बाबा को भुला देती हैं। अब इन गलियों को हमें बन्द करना है। वेस्ट थॉट चलते ही इससे हैं । बाबा ने कहा - इन गलियों को बन्द करने का रास्ता एक ही शब्द याद रखो - पर उपकारी। अगर पर उपकार की गली वा रास्ता खुला हुआ है तो यह गलियां जो हैं - वह बन्द हो जाती हैं। यही पुरुषार्थ सभी करते हैं। अटेन्शन भी रखते ही हैं। परन्तु यदि कभी गलती से पुराने संस्कारों के वश इन गलियों में चले जाते हैं तो रिजल्ट क्या होती है? भटककर लौटकर ही आना पड़ता है ना। कुछ मिलता तो नहीं है। मंजिल तो नहीं मिलती है ना। भटककर लौटना ही पड़ता है। खुद को ही परेशान होना पड़ता है इसलिए उन गलियों को एकदम बन्द करो, ब्लाक करो। बन्द करने से क्या होगा बिल्कुल ही पर उपकारी और हमारे लिए संसार ही बाबा है, बस । हम तो यही सोचते हैं कि बुद्धि जाये कहाँ । कुछ है क्या? नहीं है ना। यही तो योग है। योग का अर्थ भी यही है कि बाबा को याद करना। जब है ही संसार बाबा तो फिर क्या है ? और अमृतवेले इस ही सर्व सम्बन्धों को, सर्व प्राप्तियों को फिर से रिवाइज करते रहते हैं । बाबा आप ही सर्व सम्बन्धी हैं, आप ही सर्व प्राप्तियों के दाता हैं। तो सारा दिन वही याद होगी ना। तो हॉस्पिटल में नहीं लेकिन होली स्थल पर रहने वाले होलीहंस हो । सदा होली हैं और टोली खाते रहते हैं। होली, बोली और टोली। टोली ही हमारी गोली है । तो बहुत अच्छा प्रोग्राम रखा है और जिस उमंग उत्साह से यह प्रोग्राम रखा है उसमें सफलता तो है ही है। सफलता होगी या नहीं होगी, उसका तो क्वेश्चन ही नहीं है। हमारी विजय निश्चित है। विजय का तिलक पक्का है या कभी कभी ढीला हो जाता है ? आज नहीं सदा । बाबा को सदा शब्द बहुत अच्छा लगता है। और हम चाहते भी सदा हैं, कभी कभी तो चाहते नहीं हैं इसलिए होलीहंसों का होलीस्थल है। यहाँ तो ब्रह्मा भोजन खाओ, ज्ञान अमृत पियो और मौज मनाओ और क्या करना है? हमारी लाइफ ही ऐसी मौज की है, जो अमृतवेले से मौज शुरू होती है और रात को सोते टाइम मौज से सो जाते हैं। क्यों? क्योंकि शिवबाबा का साथ है। जहाँ शिवबाबा का साथ है वहाँ मौज ही मौज है। या मूंझना भी है थोड़ा? मूंझना अभी बन्द हो गया । प्रश्न बन्द, प्रसन्नचित्त । योग तो जितना करो उतना अच्छे ते अच्छा है। आप लोगों के सम्बन्ध-सम्पर्क में जो आयेंगे उन्हों को भी वह शक्ति मिलेगी। अच्छा।


 

दादी जानकी जी की अनमोल शिक्षायें “परिवार में सबके साथ मिलकर चलना है तो कभी अन्दर कडुवापन, रूखापन ना हो" (02-01-07)

1) बाबा की मुरली का सार है - कारण वा समस्या शब्द को छोड़ निवारण और समाधान स्वरूप बनो। मीठा मुखड़ा, मीठा मुख हो, रूखापन निकल जाए, नेचुरल मुस्कुराहट हो।

2) हमारे चेहरे में जरा भी चेन्ज न आये, जरा भी भारीपन न आये, ईश्वरीय स्नेह हमें रूहानियत में रहने देता है, जब तक मैं बाबा से ईश्वरीय स्नेह नहीं खींचती हूँ तब तक रूहानियत में नहीं रह सकती।

3) रूहानियत में रहना माना मेरे में पूरा इसेन्स भरा हो। कारण चारों ओर से आयेंगे लेकिन हमारे मन में कोई ऐसी उत्पत्ति न हो जो चेहरे पर आ जाए, उसके लिए विशेष हम ईश्वर के प्यार में इतना डूबे रहें जो कोई बात न आये । मन और दिल का गहरा कनेक्शन है। दिल में कोई भी सूक्ष्म आश है, इच्छा है वो पूर्ण नहीं हो रही है, तो जो बाबा मेरे को देने चाहता है वो मैं नहीं ले रही हूँ।

4) बाबा जब ड्रिल कराता है तब तो बाबा अपनी पावर से ड्रिल कराता है, इसलिए वो सहज हो जाता है लेकिन प्रैक्टिकली मेरे में इतनी पावर हो जो एक सेकेण्ड में अशरीरी हो शान्तिधाम में चली जाऊं फिर सुखधाम में चली जाऊं। ऐसी गुप्त रिहर्सल हो इतनी तमन्ना चाहिए।

5) दिल और मन इन दोनों का गहरा कनेक्शन है। मन चाहता है शान्ति में रहूं, पर दिल में जो बात है, बाबा को भी सुनाते हैं कि बाबा मैं तो अच्छा हूँ, पर यह बात ही ऐसी है ना। जैसे चार रास्ते पर अगर एक सेकेण्ड सोचा नहीं कि इधर जाने से क्या फायदा, इधर जाने से क्या नुकसान, गलत रास्ते पर जाने से नुकसान हो जाता है। इशारा लिखा हुआ भी है कि यहाँ से जाना है लेकिन दिल में कन्फ्यूज़न है, इशारे पर ध्यान नहीं गया तो फिर वापस लौटना पड़ता है।

6) बाबा ने कहा तुम बच्चों को कभी दिलशिकस्त नहीं होना है। दिलशिकस्त होने के कारण भी कई चले गये, उसको फालो करने वाले पैसेन्जर भी रांग चले जाते हैं, फिर वापस आना पड़ता है, इसमें टाइम तो वेस्ट जाता है ना। टाइम जब वेस्ट होता है तो दिलशिकस्त हो जाते हैं।

7) बाबा ने कहा है - समय बड़ा खजाना है, समय बड़ी कमाई राता है। मैं जरा भी एक सेकेण्ड भी फीलिंग में आई, निमित्त भले यह तन बना, मन बना, धन बना या जन बना उसी चिन्तन में चली गई, तो उस जाल में फंस गई, बाप से दूर हो गई। किसी भी प्रकार के चिन्तन ने बाबा से मेरे को दूर कर दिया, अकेली हो गई तब व्यर्थ बातों ने व्यर्थ का घेराव कर लिया, उस घड़ी फिर मुश्किल ये है कि रांग महसूस नहीं होता है फिर औरों के लिए प्रेम भाव भी छूट जाता है।

8) वर्तमान समय चाहे ब्राह्मण हैं, चाहे बाहर वाले हैं - तीन बातें हैं - मंझना, घबराना, डरना । हरेक अपने से पूछे कभी मैं डरती हूँ? अगर मैं मंझती, घबराती या डरती हूँ तो मेरा भविष्य क्या ? अपने आप से सवाल पूछ करके स्पष्ट कर लें या बाबा की बातें याद करके स्पष्ट कर लें। कन्फ्यूज़ होना माना जैसे कोई फ्यूज उड़ जाये तो क्या होगा! मुंझारा हो जायेगा ना, अंधेरे में घबराहट होगी, डर लगेगा। अंधियारा हो गया तो चोर भी आ जायेगा ।

9) कई बार कन्फ्यूज़ होने से बाबा की बात सुनाई नहीं देती है । माया पहले अकेला करती है फिर अकेले में वार करती है। अगर कडुवापन, रूखापन होगा तो किसी का साथ नहीं मिलेगा । बाबा भी देखता है, इसमें साथ लेने का, परिवार से मिलकर चलने का अक्ल नहीं है। सबके साथ अगर सम्बन्ध अच्छा है तो बाबा एक्स्ट्रा प्यार करता है।

10) जब परीक्षा आती है तो प्रतिज्ञा भूल जाती है। एक बारी मैने प्रतिज्ञा कर ली कि याद और सेवा मेरे दिल से नहीं जायेगी। तो ऐसे में बाबा भी साथ देता है। अगर मैं मूंझी हुई बैठी रहूंगी तो बाबा भी कैसे साथ देगा! 11) बाबा बुद्धू किसको कहते हैं? अगर बाबा की बातों को समझ नहीं सकते, बुद्धि दूरादेशी, महीन नहीं है तो बाबा कहेगा यह बुद्धू है। बाबा दो टाइटल देता है - बुद्धू और भगत । जो विचार सागर मंथन न कर सके, जो समय पर सेवा में हाज़िर न हो सके वो बुद्धू हुआ ना । बाबा ने जो हमको ज्ञान धन दिया है, अगर हम दाता नहीं बन सकी तो बुद्धू हुई ना !

12) बाबा की साकार मुरली बुद्धि खोलने वाली है। बाबा की । बातों को समझने समझाने की ताकत तभी आ सकती है जब अन्दर वेस्ट नहीं है। दिल में कोई बात की भी इच्छा तमन्ना न हो तो बेड़ा पार है। अपने मन को स्वच्छ रखो, इसमें भले बुद्धू बनो।

13) बेगरी पार्ट के समय भी बाबा का निश्चय देखने जैसा था, निश्चय के बल से बाबा सदा निश्चिंत रहा। हम बच्चों का भी काम है सदा निश्चिंत रहना। बाबा हमारा साथी तब है जब हम एक-दो को बाबा के समीप लाने का ध्यान रखते हैं। अगर हम किसकी केयर नहीं करते हैं, ये तो ठीक नहीं है, ये ऐसा है, तो स्नेही बनकर नहीं रह सकते।

14) एक है सूक्ष्म ब्लाकेज़, जिस कारण जो मैं चाहती हूँ वह कर नहीं सकती। फिर आता है बॉण्डेज (बन्धन), मेरी बुद्धि बेहद में नहीं जा सकती। बाबा ने निर्बन्धन भव का वरदान दिया है तो मैं अपने को चेक करूं मैं कोई बन्धन में बंधी हुई तो नहीं हूँ? कोई का भी बंधन न हो, न सेन्टर का, न किसी का। ऐसे अपने आपको बन्धन मुक्त बनाना है तब ही बन्धनमुक्त होकर सेवा कर सकेंगे।

15) बाबा ने कहा है अपनी नेचर को नेचुरल बनाओ। अगर नेचर मेरी नेचुरल नहीं हुई तो मेरी कोई पुरानी नेचर या कोई न कोई की नेचर बैरियर बन जाती है । बन्धन भी नहीं है पर थोड़ी बैरियर है। छोटी-छोटी बातों में पेन (दर्द) हो जाता है तो आंखों में आंसू भर आते हैं। आंखे भर जाना यह अपने लिए खतरे की घंटी है। कभी भी किसी कारण से आवाज भारी हुआ तो इज्जत गई। क्या सेवा होगी! किसी को तीर कैसे लगेगा। तो न ब्लाकेज हो, न बॉण्डेज हो, न बैरीयर हो । फिर अनुभव कहता है कई सूक्ष्म सेवायें अनेक सम्पर्क वालों की, ब्राह्मण आत्माओं की, स्वयं की एक ही समय पर सब प्रकार की सेवा कर सकेंगे।

16 ) चार प्रकार की सेवा हर समय हमारे सामने है स्वयं की, साथियों की, ब्राह्मण आत्माओं की, सारे विश्व की, हर एक को हमारे से ऐसी फीलिंग आये कि ये हमारे हैं। इसके लिए सेल्फ पर पूरा ध्यान हो। अगर मैंने दूसरों पर अंगुली उठाई तो वो मेरे पर उठायेंगे। गुम्बज़ की तरह आवाज गूंजता है, जो मैं बोलूंगी वही मैं सुनूंगी। जैसा मैं सोचती हूँ, ऐसा मेरे लिए सब सोचेंगे।

17 ) जैसे भगवान रहम का सागर है वो किसी भी आत्मा के गुण अवगुण नहीं देखता है। बाबा भूल को भी भुलवा देता है। कोई अपनी भूल बताता नहीं है, बताता भी है तो आधी बताता है, छिपाता है। कोई बाबा को बताता है - बाबा मेरे से ये भूल हुई तो बाबा इतना रहम करता है जो भूल को भुलवा के उसको समझदार बना देता है। इस तरह से हम भी अपने ऊपर रहम करें।

18) बाबा ने हमारे में जो उम्मीदे रखी हैं वह कहाँ तक पूरी की हैं? जैसे साकार बाबा, चाहे अव्यक्त बाबा सेकेण्ड में अशरीरी बना देता है, ऐसे हम कहाँ तक बने हैं! बाबा ने ऐसी दृष्टि दी है जो हम हिल भी न सकें, कुछ बोल भी न सकें, अन्दर में खुशी हो गई । बाबा कहते इसमें बाप समान बनो।

19) हमारी नेचर बाप जैसी नेचुरल हो जाए। जब तक हमारी कोई भी नाम रूप वाली नेचर है, तो बाप जैसी सेवा नहीं कर सकते। सेकेण्ड में किसको हल्का कर दूं, एक सेकेण्ड में हल्का हो जाऊं, वह नहीं हो सकेगा। अगर कोई भी भारीपन है तो विश्व परिवर्तक, विश्व कल्याणकारी कैसे बन सकूंगी। अच्छा!

 


दादी प्रकाशमणि जी के अमृत वचन “माया से निर्भय रहो तो विजयी बन जायेंगे"

भाग्य विधाता, वरदाता बाप ने हम सभी बच्चों को अनेक वरदान दिये हैं। परन्तु उसमें पहला वर दिया कि तुम सभी शिववंशी हो। एक शिवबाबा के वंश के हो। जिससे पहला- पहला नाता जोड़ा कि हम सब भाई-भाई हैं। दूसरा नाता जोड़ा कि हम ब्रह्मा की औलाद ब्रह्माकुमार कुमारी हैं। ब्राह्मण कुल के हैं। ऊंच धर्म के, ऊंच कुल के, ऊंच चोटी हैं। तो पहले हम  संगम के इस वरदान पर खड़े रहते । भविष्य में तो ऊंच पद पाने का लक्ष्य है ही परन्तु अपने आपको पहले इस स्थिति पर रोज़ देखो कि हम शिव वंशी हैं। आज बाबा ने कहा - मैं आया हूँ तुम बच्चों को गुप्त दान देने। गुप्त दान यही दिया जो हम सबको अपना बनाया। अपने समान बनाया फिर अपना राज्य भाग्य दिया। तो पहले खुद को खुद से हरेक पूछे कि बरोबर मुझे ये नशा है कि हम खुदा के बच्चे हैं। सिर्फ बच्चे हैं, नहीं । परन्तु हमें खुदा ने अपना बनाया है, रौरव नर्क में पड़े हुए को अपनी गोदी में बिठाया है। हम इस समय प्यारे बापदादा की गोदी में खेल रहे हैं, पल रहे हैं । हमें उनका लालन-पालन मिल रहा है। फिर वही हमें सारे विश्व की नालेज देते, हिस्ट्री सुनाते, सारे सृष्टि चक्र का ज्ञान दे आप समान नालेजफुल बनाते। बाबा ने हमें इन्जीनियर्स का इंजीनियर, डाक्टर्स का डाक्टर, प्रोफेसर्स का प्रोफेसर सिर्फ एक अल्फ पढ़ाकर बना दिया। इसीलिए हमारी बुद्धि में कभी नहीं आता कि फलाना इतना पढ़ा लिखा है, यह तो जज़ है । नहीं, हमें तो बाबा ने जजों का जज बनाया है । वह क्या सत असत की तुलना करेंगे। हमें सत-असत की पूरी पहचान मिली है। वह डाक्टर्स थोड़े समय के लिए दवा देंगे, हमें तो बाबा ने ऐसी दवाई दे दी जो 21 जन्म के लिए हम निरोगी बन जाते हैं । हम ऐसे सर्जन के बच्चे मास्टर सर्जन हैं जो किसी के भी मन का रोग मिटा सकते हैं। मन से तन भी ठीक हो जाता है। न तो हरेक अपने से पूछो हमसे ऊंचा दुनिया में और कोई है? कोई महान है या हम सबसे ऊंचे से ऊंच हैं? कोई हम से बड़ा नहीं। हम सबसे बड़े ते बड़े योगी हैं। हम सबसे पवित्र हैं, हम जैसा कोई पवित्र नहीं है। हम ऊंचे ते ऊंचे सतगुरु की श्रीमत पर चलने वाले हैं। वह तो न बाप को फालो कर सकते, टीचर को, न गुरु को। हमें तो तीन इन्जन मिली हैं। हमारी गाड़ी तीन इंजन से चल रही है। परम बाप, परम शिक्षक और परम सतगुरु के हम तकदीरवान बच्चे हैं। जब हम अपनी इतनी महान तकदीर रोज़ देखते तो अन्दर से निकलता वाह बाबा वाह! वाह ड्रामा वाह! जो मेरा भाग्य बना वह औरों का भी बनें। हम तो ऊंची चोटी पर बैठे हुए ऊंचे ते ऊंचे ब्राह्मण हैं। फिर ब्राह्मण कैसे कहेंगे यह माया आती, यह होता । जैसे कोई छोटी चीज़ का भय बैठ जाता, रस्सी को भी सांप समझ भयभीत हो जाते, वैसे माया है... यह भी भय के भूत का बड़ा सांप दिमाग में रख दिया है। अब सांप तो है ही सांप। वह तो है ही विषैला । वह तो जहर ही फूकेंगा। सांप से खेलो नहीं, उससे डरते क्यों हो, वह कोई खिलौना नहीं है। सांप है तो किनारा कर लो। 5 विकार भूत हैं लेकिन वह हैं ही भूत, है ही गन्दी चीज़ । गन्दी चीज़ को देखेंगे, दृष्टि डालेंगे या उससे किनारा करके चले जायेंगे। उनके पास जायेंगे तो जरूर बदबू आयेगी । किनारे हो जाओ तो बदबू से बच जायेंगे। यह है ही छी-छी दुनिया । मैं अगर शौख से पिक्चर देखूंगी तो वह मुझे जरूर खीचेंगी। मैंने देखा तो वह जरूर आकर्षित करेगी। मैंने अटेन्शन दिया तो उसने खींचा। अगर हम कहें यह तो डर्टी है, तो वह खींच नहीं सकती। जरा भी इन्ट्रेस्ट लिया तो खींच जरूर होगी । अगर मैं परचिन्तन करूंगी तो दूसरा सुनेगा। बाबा ने कहा बच्चे इस असार संसार का समाचार न सुनो, न देखो और न वर्णन करो। यह बड़ी सुन्दर लड़की है। यह अच्छी लगती। यह चीज अच्छी है, ऐसे सोचा तो खत्म। बाबा की गोदी छोड़कर उतरते क्यों हो ! गोदी में सदैव बैठे रहो, उनकी छत्रछाया के नीचे रहो तो कोई की ताकत नहीं जो मेरे पास आये । माया आती है इसका कारण तुम उसे देखते हो । बाबा की गोदी छोड़ते हो। भय का भूत बैठा हुआ है। निर्भय बनो तो माया आ नहीं सकती। निर्भय माना कोई भी विकार की शक्ति नहीं जो मुझे डरा सके। माया हरा नहीं सकती। मैं तो महावीर - महावीरनी हूँ दुनिया की कोई भी शक्ति नहीं जो मुझे भयभीत करे या मुझे अपनी अंगुरी दिखाये। आप चैलेन्ज करो कि कोई ऐसी ताकत नहीं जो मुझे हरा सके। यह कहने की बात नहीं लेकिन अन्दर में दृढ़ता हो, इतना मास्टर सर्वशक्तिमान् बनकर रहो । अन्दर में थोड़ा भी आलस्य आया तो पूरा ही खा जायेगा । आज थोड़ा आलस्य आयेगा, कहेंगे चलो क्लास में लेट जाते, क्या फ़र्क पड़ेगा। धीरे-धीरे माया पूरा ही खा लेती। सर्विस की फील्ड में भी आलस्य के बस अनेक बहाने बनाते। दिल सच्ची नहीं तो अनेक कारण निकलते। दिल सच्ची हो तो कोई भी कारण नहीं। बाबा ने कहा बच्चे अपने संकल्पों को स्टॉप करने की प्रैक्टिस करो। अभी-अभी साकारी, अभी-अभी निराकारी स्थिति में स्थित होने का अभ्यास करो, इसके लिए नियम बनाओ। ड्रिल करो, अटेन्शन रखकर प्रैक्टिस करो तो बुद्धि शीतल और शक्तिशाली बन जायेगी। खुशी में रहेंगे। अच्छा - ओम् शान्ति ।